स्वर्ण जयंती फेलोशिप के लिए 17 युवा वैज्ञानिक चयनित

देश के अलग-अलग वैज्ञानिक संस्थानों के 17 वैज्ञानिकों को शोध संबंधी उनके नवोन्मेषी विचारों और विभिन्न विषयों में अनुसंधान एवं विकास को प्रभावी बनाने के लिए स्वर्ण जयंती फेलोशिप प्रदान की गई है।स्वर्णजयंती फेलोशिप योजना के तहत युवा वैज्ञानिकों को विज्ञान व प्रौद्योगिकी में मूलभूत अनुसंधान के लिए विशेष सहायता व संरक्षण दिया जाता है।

कोरोना की चौथी वैक्सीन ‘जायकोव-डी’ को आपातकालीन मंजूरी जल्द

कोरोना संक्रमण की संभावित तीसरी लहर से निपटने के लिए देश में युद्ध स्तर पर प्रयास किए जा रहे हैं। इन प्रयासों में ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत किया जा रहा है तो वहीं, दूसरी तरफ यह प्रयास भी किए जा रहे हैं कि अधिक से अधिक लोगों को वैक्सीन लगाई जा सके। ऐसा इसलिए क्योंकि वैक्सीन ही एकमात्र ऐसा हथियार है, जो कोरोना वायरस के प्रभाव को कम कर सकता है।

फेफड़ों के कैंसर पर अब हो सकेगा सटीक प्रहार

हाल में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) कानपुर और संजय गांधी पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेस (एसपीजीआईएमएस), लखनऊ के वैज्ञानिकों ने मिलकर एक ऐसा उपकरण विकसित किया है, जिसकी मदद से फेफड़ों के कैंसर से जूझ रहे मरीजों के उपचार में मदद मिल सकती है। इस उपकरण को ‘3डी रोबोटिक मोशन फैंटम’ नाम दिया गया है। इसके माध्यम से फेफड़ों के कैंसर के मरीजों को सटीक और कम मात्रा में भी अधिक प्रभावी रेडिएशन थेरेपी दी जा सकती सकेगी।

आर्कटिक में बर्फ पिघलने के कारण सितंबर में हो रही ज्यादा बारिश

संपूर्ण विश्व इस समय ग्लोबल वार्मिंग की समस्या से जूझ रहा है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण धरती के तापमान में लगातार वृद्धि देखने को मिल रही है, जिसके कारण उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव पर मौजूद बर्फ लगातार पिघल रही है। नेशनल सेंटर फॉर पोलर एंड ओशन रिसर्च (एनसीपीओआर) ने अपने एक हालिया अध्ययन में कहा है कि आर्कटिक सागर के कारा क्षेत्र में गर्मियों के दौरान पिघल रही बर्फ, सितंबर माह के मध्य भारत में अत्यधिक बरसात की घटनाओं का कारण हो सकती है।

अस्थि-ऊतकों के पुनर्निर्माण में सहायक नए बायोमैटिरियल का विकास

एक नए शोध से हड्डी के ऊतकों के पुनर्निर्माण (टिशू रीजनरेशन) का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। पुणे स्थित सावित्री बाई फुले विश्वविद्यालय में संकाय फेलो डॉ. गीतांजलि तोमर का यह शोध रीजनरेटिव थेरेपीज (पुनरोत्पादन उपचार पद्धतियों) को लेकर बोन टिशूज के लिए दवाएं उपलब्ध कराने की दिशा में एक कदम है।इस अध्ययन में एक नैनो बायोमैटीरियल को दो अणुओं या हाइड्रोक्सीपेप्टिट-पैराथिरोइड नाम के हार्मोन नैनोकोन्जुगेट के बीच एक स्थायी कड़ी से जोड़ा गया है।

ग्लेशियरों के पिघलने से प्रभावित हो सकते हैं सौ करोड़ लोग

समूचे विश्व के लिए आज जलवायु परिवर्तन एक चुनौती है। जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। इस कारण नदियों-सागरों के जलस्तर में वृद्धि हो रही है, जो भविष्य में विकराल रूप ले सकती है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) इंदौर द्वारा किए गए अध्ययन में यह बात सामने आई है कि जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालय पर्वत श्रृंखलाओं में बर्फ और ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। इस कारण हिमालय से निकलने वाली सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी नदियों के जलस्तर में वृद्धि देखने को मिली है।

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