Exclusive Interview with Dr Indu Choudhary : सबको साथ लेकर समृद्ध और खुशहाल भारत का निर्माण करना चाहते थे बाबा साहब

देश की जानी-मानी दलित चिंतक एवं बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. इंदु चौधरी बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर के विचारों को जन-जन तक पहुंचाने में दिन-रात जुटी हुई हैं। वह समाज के वंचित, शोषित और उपेक्षित तबके को उसके अधिकारों से अवगत करा रही हैं।

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बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (बीएचयू) की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. इंदु चौधरी जानी-मानी दलित चिंतक हैं। वह पूरे देश का दौरा कर समाज के उपेक्षित, वंचित और गरीब तबके को उसके अधिकारों के प्रति जागरूक कर रही हैं। साथ ही विश्व रत्न बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर और भगवान बुद्ध के विचारों को उन तक पहुंचा रही हैं। उनका कहना है कि जिस दिन देश में सबको बाबा साहब द्वारा बनाए गए संविधान की प्रस्तावना और मूल भावना के अनुरूप भेदभाव के बगैर बराबरी का हक मिलने लगेगा, उस दिन बाबा साहब का सपना साकार हो सकेगा। उनका कहना है कि बाबा साहब की सोच व्यापक थी। वह सभी को साथ लेकर समृद्ध और खुशहाल भारत का निर्माण करना चाहते थे, लेकिन उस समय के एक राजनीतिक वर्ग ने अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए उनको एक समाज विशेष के प्रतिनिधि के रूप में प्रचारित करके, उनके योगदान को साजिशन एक दायरे में सीमित कर दिया। डॉ. इंदु चौधरी कहती हैं कि जब उन्होंने बीएचयू ज्वाइन किया तो उन्हें जातिगत भेदभाव झेलना पड़ा। इसी से उन्हें समाजसेवा की प्रेरणा मिली। उन्होंने उसी समय प्रण ले लिया कि ऐसा भेदभाव वह दूसरों के साथ अब नहीं होने देंगी। डॉ. इंदु चौधरी के आज लाखों फॉलोवर हैं और वह समाज को जागरूक करने के लक्ष्य में कामयाब होती दिख रही हैं। वह बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर और मान्यवर कांशीराम को अपना आदर्श मानती हैं। हिंदी न्यूज पोर्टल senani.in की संवाददाता सोनाली सिंह ने डॉ. इंदु चौधरी से विभिन्न मुद्दों पर exclusive बात की। प्रस्तुत हैं, उनसे बातचीत के कुछ अंश-

डॉ. इंदु चौधरी, असिस्टेंट प्रोफेसर, बीएचयू, समाज सुधारक

आप अपने बचपन और शिक्षा के बारे में बताएं।

मेरा जन्म लखनऊ में हुआ है।शिक्षा भी लखनऊ में ही हुई। लखनऊ विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में एमए और यहीं से पीएचडी किया है।

आपको समाजसेवा की प्रेरणा कहां से मिली?

मैं जो कर रही हूं, मेरी दृष्टि में यह समाजसेवा नहीं है। आप जब कोई काम करते हैं, तो उसमें एक संतुष्टि महसूस करते हैं। चार साल यूपी सैनिक स्कूल, लखनऊ में लेक्चरर के रूप में सेवा देने के बाद जब मैंने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर ज्वाइन किया तो ज्वाइनिंग के छह माह के भीतर ही जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ा। इस पर यह सोचने पर मजबूर हो गई कि जब इतनी पढ़ी-लिखी होने के बावजूद मेरे साथ इस तरह भेदभाव हो रहा है, तो हमारे समाज के लोग रोजाना न जाने कितने प्रकार का भेदभाव झेलते होंगे? खासतौर पर वो, जो लोग अनपढ़ हैं। गरीब हैं। लाचार हैं। उनको कितने भेदभाव का सामना करना पड़ता होगा? यह सोचकर मैं मजबूर हो गई कि मेरी शिक्षा का सही मायने में अर्थ तभी निकलेगा, जब मैं समाज के उस तबके को सशक्त होने का अहसास करा सकूं और उसमें शिक्षा के जरिये जागरूकता ला सकूं। इस प्रकार मुझे लोगों के बीच काम करने की प्रेरणा मिली।

उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के धरमपुर गांव में आयोजित एक सभा को संबोधित करतीं डॉ. इंदु चौधरी। फाइल फोटो

आप अपने प्रयासों में खुद को कितना सफल मानती हैं?

जो काम मैं कर रही हूं, उसमें सफल-असफल होने जैसी कोई बात नहीं है। हम सामाजिक परिवर्तन के लिए कार्य कर रहे हैं। ऐसे में कई बार हमें बहुत सारी समस्याएं भी झेलनी पड़ती हैं। लेकिन, लोगों का स्नेह इतना मिलता है कि उसके आगे ये समस्याएं याद नहीं रहतीं। परिवर्तन, चूंकि सतत चलने वाली प्रक्रिया है। इसलिए जब कोई महिला यह कहती है कि मैंने इस अंधविश्वास से मुक्ति पा ली कि औरतें कुछ नहीं कर सकतीं? कहती हैं कि मैंने अपनी बेटी को इतना पढ़ाया-लिखाया कि वह आज लड़कों से किसी मायने में कम नहीं है, मेरा काम आसान कर देती हैं। आडंबर और पाखंड को छोड़कर महिलाएं शिक्षा की ओर जितना ध्यान देंगी, उतना ज्यादा उनका विकास होगा।

आपको कब लगेगा कि लोगों को जागरूक करने का आपका मिशन पूरा हो गया है?

मैंने आपसे कहा न कि परिवर्तन सतत चलने वाली प्रक्रिया है। मैं केवल यह सोचूं कि मेरे ही द्वारा यह कार्य संपादित हो जाएगा, तो मैं सर्वथा गलत होऊंगी। ऐसा इसलिए क्योंकि अगर इतिहास देखा जाए, चाहे भारत का हो या विश्व का इतिहास, कोई भी परिवर्तन स्थायी नहीं रहता। सत्य की विजय हमेशा होती है। झूठ, आडंबर और पाखंड की दुनिया बहुत सीमित है। जब महिलाएं स्वयं को किसी से कम न समझकर अपने विकास के लिए, अपने परिवार के विकास के लिए अपने महापुरुषों के जीवन से प्रेरणा लेकर अपने बच्चों के विकास के लिए जागरूक हो जाएंगी, यह मानूंगी कि मैं अपनी कोशिशों में सफल हो रही हूं। साथ ही पुरुष भी अपने इतिहास से प्रेरणा लेकर (जैसा कि महात्मा ज्योतिबा राव फुले ने अपनी पत्नी माता सावित्री बाई फुले को शिक्षित किया और फिर दंपती ने मिलकर न जाने कितने सारे शिक्षण संस्थान खोले? अनाथ आश्रम खोले, विधवा आश्रम खोला और भी बहुत सारे समाज के लिए कार्य किए) अपने घर, समाज की महिलाओं को शिक्षित और सशक्त बनाएं।

एक बैठक में लोगों को बाबा साहब के आदर्शों की जानकारी देतीं डॉ. इंदु चौधरी। फाइल फोटो

आप अपनी सभाओं में अक्सर दलितों और पिछड़ों के साथ मुस्लिमों के गठजोड़ की बात करती हैं।

बाबा साहब का जीवन हमारा आदर्श है और हम उनसे प्रेरणा लेकर समाज के उस तबके को एकजुट करने का प्रयास कर रहे हैं, जो सदियों से हाशिए पर रखा गया। आपने जो प्रश्न किया है, उसके जवाब में मुझे बस इतना कहना है कि जिस समय जातिगत दुर्भावना का शिकार बाबा साहब डॉ. भीम साहब अंबेडकर जैसा व्यक्तित्व हो रहा था, उस समय मुसलमानों ने खुलकर बाबा साहब को न केवल अपनाया, बल्कि उनका सहयोग भी किया। चाहे वह द्वितीय और तृतीय गोलमेज कांफ्रेंस हो या फिर रोजा इफ्तार की पार्टी में मौलाना हसरत मोहनी द्वारा बाबा साहब की प्लेट में एक साथ बैठकर खाना खाना हो। ऐसे उदाहरण हमें हमेशा प्रेरणा देते हैं कि जिस समाज को लेकर बाबा साहब आगे बढ़ रहे थे, उनको पूरी तरह सहयोग सिर्फ मुसलमानों ने ही किया। जिस जाति में पैदा होना अभिशाप बन गया था और उसी धर्म के तथाकथित उच्च जाति के लोग बाबा साहब के साथ भेदभाव कर रहे थे और उनके समाज के साथ जानवर से भी बदतर सलूक कर रहे थे, वैसे में यदि एक धर्म विशेष के लोग आपका सहयोग करते हैं तो वह निश्चित रूप से स्वागतयोग्य है। इसलिए हमें अब ज्यादा दिमाग नहीं लगाना है। जो विचारधारा हमको बाबा साहब और मान्यवर कांशीराम साहब देकर गए हैं, हमें सिर्फ उसी को आगे बढ़ाना है।

आपकी नजर में बाबा साहब का सपना क्या था?

बाबा साहब के बस दो ही सपने थे। बहुजन समाज को शासक कौम बनाना और भारत को बुद्धमय बनाना। बुद्धमय बनाने से बाबा साहब का अर्थ केवल साइंटिफिक यानी वैज्ञानिक सोच का विकास करना और वैज्ञानिक सोच पर आधारित समाज का निर्माण करना था। जिससे, अंधविश्वास, पाखंड और आडंबर में फंसे समाज, जोकि केवल भाग्य और भगवान के भरोसे रहता है, वह अपनी तर्क शक्ति का प्रयोग कर स्वयं व समाज के विकास में अपना योगदान दे। समाज का वह तबका, जो सदियों से हाशिए पर रहा है, जिसको शासन सत्ता में कभी हिस्सेदारी नहीं मिली, वह अपने अधिकारों को संविधान द्वारा प्राप्त कर एकजुट रहकर, शासक कौम बने, यही बाबा साहब का सपना था। बाबा साहब के इस सपने को साकार करने की जिम्मेदारी हम सबकी है।

एक सभा में लोगों से घिरीं डॉ. इंदु चौधरी। फाइल फोटो

दलितों को आप किस मुकाम पर देखना चाहती हैं?

समाज का विकास करने के लिए हमें बहुत ज्यादा अपना दिमाग इस्तेमाल करने की जरूरत नहीं है। वरन, जो भारतीय संविधान की प्रस्तावना और भारतीय संविधान का मूल है, भारत के प्रत्येक नागरिक को धर्म, लिंग, जाति या किसी भी प्रकार के भेद के बगैर एक समान अधिकार दिला दें, सिर्फ संविधान को शत-प्रतिशत ईमानदारी से लागू कर लें तो भी हम भारत को एक अच्छा देश बना सकते हैं। भारत का संविधान, जो बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर इस देश को देकर गए, उसकी मंशा यही है कि केंद्र व राज्य सरकारों की यह जिम्मेदारी है कि वह ईमानदारी से प्रत्येक नागरिक को स्वास्थ्य, शिक्षा और सुरक्षा की दिशा में कार्य करें।

समाज का एक तबका आपको अपना आदर्श मानता है। इससे आपकी जिम्मेदारी और बढ़ जाती है।

बिल्कुल! बाबा साहब, जो भारतीय संविधान के रचयिता भी हैं, देश के विकास के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की स्थापना उनकी सोच का ही परिणाम है। देश में जितनी भी नदी, बांध, बिजली और सिंचाई परियोजनाएं हैं, वह उन्हीं की सोच का परिणाम हैं। लेकिन, उनके दायरे को सीमित कर उन्हें केवल दलितों का मसीहा बोला जाता है। उसी प्रकार मेरे नजरिए को भी दलितों तक सीमित न माना जाए। हम समाज के उत्थान के लिए, सभी को जागरूक करने के लिए, बहुजन महापुरुष, जोकि महिलाओं के लिए और समाज के कमजोर तबके के उत्थान के लिए, शिक्षा के लिए जिन लोगों ने भी काम किया, उनको अपना आदर्श मानते हैं। इसीलिए हाशिए पर रहे समाज को मुख्यधारा तक लाने का प्रयास जो हम कर रहे हैं, उसको सिर्फ एक जाति, धर्म, या लिंग से जोड़कर न देखा जाए, बल्कि एक वृहद रूप में समाज को एकजुट करने की कोशिश के रूप में देखा जाए। हमारा प्रयास है कि जो भी समाज हाशिए पर रह रहा है, वह मुख्यधारा में आए और शासक बने। यही हमारा सपना है।

उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले में एक सभा को संबोधित करतीं डॉ. इंदु चौधरी। फाइल फोटो

समाजसेवा क्या निजी जिंदगी में त्याग मांगती है?

बाबा साहब ने कहा था, समाजसेवा का कार्य करना बहुत कठिन है, क्योंकि इसमें कई बार आपको जलील होना पड़ता है और कई बार आपको बहुत प्रशंसा भी मिलती है। यह बात सत्य है क्योंकि हमने दोनों ही तरीके की बातों को खुद पर सहन किया है। इसके साथ ही बाबा साहब का जो कथन है कि समाजसेवा बहुत त्याग मांगती है, हमें बहुत अच्छे से समझ में आ गई है क्योंकि जब तक आप काम से प्यार नहीं करेंगे तब तक आप किसी भी मंजिल तक नहीं पहुंच सकते हैं। इसके लिए निजी जिंदगी में हमको कुछ त्याग करने पड़ते हैं, तभी हम लोगों के बीच में जाकर उनकी समस्याओं को, उनकी जरूरतों के हिसाब से उनको गाइड और जागरूक कर सकते हैं।

महिलाओं और युवतियों में काफी लोकप्रिय हैं डॉ. इंदु चौधरी। एक सभा की फाइल फोटो

समाज के लिए आपका संदेश

भारत की संसद में लगी बाबा साहब की मूर्ति से हमें संदेश लेना चाहिए। उनकी वो उंगली इशारा कर रही है कि तुम्हारे दुखों की मुक्ति का रास्ता जाता है इस संसद से। उठो… जागो, जगाओ और इस संसद पर कब्जा करो।

हां, एक बात और, देश की एकता, अखंडता उसके लोगों में निहित है। ऐसी किसी भी शक्ति या ताकत का विरोध कीजिए जो इस अखंडता को मिटाने का काम कर रही है। जैसे जातिवाद, नफरत, धर्म, क्षेत्रवाद, लिंगभेद। इनसे ऊपर उठकर एक समग्र भारत का निर्माण करें।

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