हर्बल गुलाल ने राजस्थान की जनजातियों के जीवन में भरे रंग

श्रीनाथ राजस्थान ग्रामीण आजीविका विकास परिषद (राजीविका), मगवास की सदस्य ग्रामीण महिलाओं ने अपनी युगों पुरानी परंपरा और प्रथा को बनाया रोजगार का जरिया

senani.in || डिजिटल डेस्क

जंगल के उत्पादों को जमा करने वाली जनजातियों के लिए वनधन जनजातीय स्टार्ट-अप की पहल वरदान साबित हो रही है। लघु वनोत्पाद (एमएफपी) पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) प्रणाली से इन जनजातियों को उनके उत्पादों की बिक्री में काफी सहूलियत हुई है। ये पहल ट्राइफेड द्वारा की जा रही है।

ट्राइफेड, केंद्र सरकार के जनजातीय कार्य मंत्रालय के अधीन काम करता है और उसने इस चुनौतीपूर्ण समय में रोजगार सृजन कर जनजातियों के आर्थिक दबाव को दूर करने में अहम भूमिका निभाई है। वनधन योजना से कई उपलब्धियां हासिल हुई हैं। लेकिन, हाल में जिस उपलब्धि की चर्चा हो रही है, वह राजस्थान के एक वीडीवीके समूह श्रीनाथ राजस्थान ग्रामीण आजीविका विकास परिषद (राजीविका), मगवास से जुड़ी है।

एक कार्यक्रम में जुटे अधिकारी और सदस्य फोटो क्रेडिट : पीआइबी हिंदी

राजस्थान में वनधन विकास समूहों से जुड़े 57,292 लाभार्थी

राजस्थान में पिछले वर्ष 3019 वनधन विकास केंद्रों को 189 समूहों में शामिल किया गया था। ये समूह लगभग 57,292 लाभार्थियों की मदद कर रहे हैं। इन वनधन विकास केंद्रों (वीडीवीके) को 2224 वनधन विकास केंद्र समूहों में समेटा गया है। प्रत्येक समूह में तीन सौ वनवासी हैं। पूरे देश में ट्राइफेड ने दो साल से भी कम समय में इनकी मंजूरी दी थी।

हर्बल गुलाल बनातीं सदस्य महिलाएं। फोटो क्रेडिट : पीआइबी हिंदी

पांच लाख 80 हजार रुपये का बेचा गुलाल

राजस्थान के इन समूहों में से एक समूह वनधन विकास केंद्र समूह, श्रीनाथ राजीविका, मगवास की एक शानदार दास्तान है। अपनी दिग्गज उद्यमी मुगली बाई की जानदार रहनुमाई में इस वीडीवीके समूह ने कम समय में ही बड़ी मात्रा में हर्बल गुलाल की बिक्री की है। बताया जाता है कि इस हर्बल गुलाल की बिक्री पांच लाख 80 हजार रुपये में हुई है।

ऐसे बनाते हैं हर्बल गुलाल

उदयपुर के झाडोल के जनजातीय लोग इलाके के घने जंगलों से पलाश, कनेर, रांजका और गेंदा के ताजा फूल जमा करते हैं। जमा किए हुए फूलों को श्रीनाथ वनधन विकास केंद्र, मगवास ले जाया जाता है। फूलों को बड़े-बड़े बर्तनों में पानी में उबाला जाता है। यह प्रक्रिया दो से तीन घंटे चलती है, ताकि पानी में फूलों का रंग पूरी तरह उतर आए। यह रंग फूलों का स्वाभाविक रंग होता है। इसके बाद रंगीन पानी को छाना जाता है और उसमें मक्के का आटा मिलाया जाता है। इसमें गुलाब-जल मिलाकर उसे आटे के रूप में पीस लिया जाता है। जनजातीय लोग इसके बाद हाथ से शुद्ध किए हुए इस हर्बल गुलाल को सुखाते हैं और कोई कचरा आदि होने पर उसे निकाल देते हैं। शुद्ध गुलाल को फिर आकर्षक पैकटों में बंद कर बेचा जाता है। इन पत्तियों से हर्बल गुलाल बनाने के काम में छह सौ से अधिक महिलाएं लगी हैं।

सदियों पुरानी परंपरा को मिला बाजार का साथ

उद्यमशीलता की यह अनोखी दास्तान युगों पुरानी परिपाटी और परंपरा के बल पर चली आ रही है। यह इस बात का प्रमाण है कि वनधन योजना किस तरह जनजातीय आबादी को लाभ पहुंचा रही है।

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ऐसे बनती है चेन

एक वनधन विकास केंद्र में 20 जनजातीय सदस्य होते हैं। ऐसे 15 वनधन विकास केंद्र मिलकर एक वनधन विकास केंद्र समूह बनाते हैं। वनधन विकास केंद्र समूह (वीडीवीकेसी), वनधन विकास केंद्रों को बिक्री, आजीविका और बाजार तक पहुंच और उद्यम अवसर प्रदान करते हैं।

6.67 लाख जनजातीय लोगों को उद्यमिता का अवसर

23 राज्यों और दो केंद्र शासित प्रदेशों के जंगलों के उत्पाद जमा करने वाले लगभग 6.67 लाख जनजातीय लोगों को वनधन योजना से उद्यमिता का अवसर मिला है। कार्यक्रम की सफलता इस बात में देखी जा सकती है कि लाखों जनजातीय लोगों को पहले ही वनधन स्टार्ट-अप कार्यक्रमों का लाभ मिल चुका है।

लोकल फॉर वोकल को मिलेगा बल

जनजातीय आबादी की आजीविका में सुधार लाना और वंचित व जोखिम वाले जनजातीय लोगों के जीवन को बेहतर बनाना ट्राइफेड का मिशन है। उम्मीद की जाती है कि वनधन योजना पहल के बल पर आने वाले दिनों में कामयाबी की ज्यादा से ज्यादा दास्तानें सुनने को मिलेंगी। इससे ‘वोकल फॉर लोकल’ और आत्मनिर्भर भारत की भावना को ताकत मिलेगी। साथ ही जनजातीय लोगों की आजीविका, आय और जीवन में सुधार आएगा।

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