वीडियो स्टोरी : पौष पूर्णिमा 28 जनवरी को, इस दिन होती है मां शाकंभरी की पूजा, जानिए कौन हैं मां शाकंभरी

Topics : Dharam Karam, Poush Purnima, Shakambhari Jayanti

राजस्थान के सकरायधाम स्थित माता शाकंभरी का दरबार photo credit : social media

गुरु पुष्य और राजयोग में आई पौष पूर्णिमा, व्रत व पूजा-पाठ का मिलेगा हजार गुना पुण्य

शाकंभरी जयंती भी कहते हैं पौष पूर्णिमा को, इस दिन जरूर करें दुर्गा सप्तशती का पाठ

POSTED BY SRISHTI SINGH || JANUARY 26, 2021

senani.in news

वर्ष 2021 में पौष पूर्णिमा 28 जनवरी को पड़ रही है। यह व्रत करने से संतान का जीवन सुख-समृद्धि से भरपूर होता है। जिनको संतान नहीं है, उनको संतान की प्राप्ति होती है। इसलिए पौष पूर्णिमा का सनातन धर्म में बहुत ही ज्यादा महत्व है।

जमशेदपुर में प्रवास कर रहे देश के प्रसिद्ध ज्योतिषी आचार्य डॉ. सुधानंद झा का कहना है कि इस दिन तीर्थस्थल और नदियों में स्नान की मान्यता है। तीर्थस्थल पर स्नान का अवसर न मिले तो नदी, कुएं या तालाब में स्नान करें। यह भी संभव न हो तो घर में ही स्नान करें। हां, जिस जल में स्नान करते हैं, उसी में गंगा जी का ध्यान करें। उसी जल में नदी तीर्थ का ध्यान करें। जितने भी सनातन धर्म के तीर्थस्थलों के बारे में आपको जानकारी है, उनका ध्यान करके स्नान करें। घर में स्नान करते समय हाथ में जल लेकर गंगा जी और नदी तीर्थ का ध्यान करें फिर इस जल को स्नान पात्र में डाल दें। पूरा जल गंगाजल के समान पवित्र हो जाएगा।

इसलिए होती है पौष पूर्णिमा की पूजा

कहा जाता है, जिनको संतान नहीं हो रही है या जिनकी संतान उन्नति नहीं कर पा रही है, वैसे माता-पिता को पौष पूर्णिमा का व्रत करना चाहिए। दान-पुण्य करना चाहिए। गरीबों की सेवा करनी चाहिए। इस बार पौष पूर्णिमा 28 जनवरी को पड़ रही है। इस दिन बृहस्पतिवार है। इसी दिन गुरु पुष्य नक्षत्र का भी संयोग है। ऐसे में इस दिन हम जो भी शुभ कार्य करते हैं। जैसे-पूजा-पाठ, दान-पुण्य आदि का हमें हजार गुना अधिक लाभ मिलता है। नदी में स्नान कर रहे हैं तो नदी से स्नान कर निकलने के बाद बालू से शिवलिंग बनाइए। शिव जी की पूजा करने के बाद शिवलिंग को नदी में मिला दीजिए।

मां दुर्गा का नाम इसलिए पड़ा शाकंभरी माता

कहा जाता है कि एक बार संसार में भीषण अकाल पड़ा। बारिश न होने के कारण सृष्टि के सभी पेड़-पौधे सूख गए या सूखने लगे। दूसरी तरफ, राक्षसों का अत्याचार बढ़ने लगा। जीव-जंतु मरने लगे। ऋषि-मुनि स्वयं को असहाय महसूस करने लगे, तब सभी देवता और संत-महात्मा मां जगदंबा की शरण में पहुंचे। मां की आराधना की। इस पर मां जगदंबा ने सभी को आश्वस्त किया। इसके बाद धरती पर भारी वर्षा हुई। लेकिन, पूरी धरती के पेड़-पौधे सुख गए थे। तत्काल ऐसा कोई उपाय नहीं था, जिससे लोगों का पेट भरा जा सके। ऐसे में मां जगदंबा ने पूरी धरती पर जहां-जहां संभव हो सका, साग उत्पन्न किया। लोगों ने साग खाकर भरण-पोषण किया। मां ने पौष पूर्णिमा के दिन बारिश की। संसार को अकाल से बचाया। चूंकि, मां ने साग, जिसे शाक भी कहते हैं, उत्पन्न किया, इसलिए मां दुर्गा का नाम शाकंभरी देवी पड़ा। इसीलिए मां दुर्गा यानी शाकंभरी देवी की पौष पूर्णिमा के दिन पूजा कीजिए।

महर्षि वाल्मीकि ने की थी गंगाष्टकम की रचना

आचार्य कहते हैं कि संभव हो सके तो इस दिन दुर्गा सप्तशती का पाठ भी कर लें। उस दिन गंगा स्तुति या गंगाष्टकम का पाठ जरूर करें। गंगाष्टकम की रचना महर्षि वाल्मीकि जी ने की थी। अयोध्या से वन जाते समय जब भगवान राम गंगा नदी पार कर रहे थे, उन्होंने गंगाष्टकम से मां गंगा की पूजा की थी। इस दिन राजयोग भी पड़ रहा है। माता दुर्गा शाकंभरी का रूप धारण की थीं, इसलिए मां दुर्गा की पूजा भी इस दिन जरूर करें।

पौष पूर्णिमा के दिन इन नियमों का पालन अवश्य करें

-आचार्य कहते हैं कि इस दिन जो लोग व्रत नहीं कर सकते, वो फलाहार करें
-फलाहार भी नहीं कर सकते तो सात्विक भोजन करें
-मांस, मदिरा और लहसून-प्याज का सेवन न करें
-ब्रह्मचर्य का पालन करें
-इस दिन किसी को भी अपने दरवाजे से निराश होकर न लौटने दें
-जितना हो सके दान-पुण्य करें
-किसी को कटु वचन न बोलें

मां शाकंभरी हैं मां दुर्गा का स्वरूप, इसलिए इस दिन जरूर सुनें या करें दुर्गा सप्तशती का पाठ

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