अरीघाती : दिक भ्रमित हूं मैं…

@शैलेश त्रिपाठी ‘शैल’

दिक भ्रमित हूं मैं, पथभ्रष्ट ना कर
अब उलझी-सुलझी बातों से, ए मित्र मुझे आकृष्ट ना कर।

तेरे हाथों ही मरना था मुझको, उनसे मरवाकर कष्ट ना कर।
दिक भ्रमित हूं मैं, पथभ्रष्ट ना कर।।

तू जरा सोचता कल का साथ,
जब हाथ में तेरे था मेरा हाथ।
क्यूं ऐसे आखेटक बन के तू
करुणामय हुआ न प्राणनाथ
अब गमनीमी कविताओं से
ए मित्र मुझे आकृष्ट ना कर
दिक भ्रष्ट हूं मैं, पथ भ्रष्ट ना कर।।

तेरी गद्दारी की गाथा, बच्चे-बच्चे को बताई जाएगी।
तू मित्र नहीं द्रोही है, ये बात वहां तक जाएगी।

तेरे वतन की धरती भी तुझको
दफनाने से फट जाएगी।
नहीं भार सहेगी धरती मां तेरा
तुझको कौवों से नुचवाएगी
अब नकाब पश्चिम का ओढ़कर
मुझको तू आकृष्ट ना कर।
दिक भ्रमित हूं मैं, पथ भ्रष्ट ना कर।।

शैलेश त्रिपाठी ‘ शैल ‘

(लेखक पंडित खुशीलाल शर्मा गवर्नमेंट ऑटोनोमस आयुर्वेदिक कॉलेज, भोपाल में अध्ययनरत हैं)

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