जगत नारायण का न्याय

मामला कितना भी फंसा क्यों न हो, न्याय देने के लिए दिमाग की जरूरत होती है। बड़ी-बड़ी दफाएं और किताबें पढ़ लेने से न्याय देना नहीं सीखा जा सकता।

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@ शैलेश त्रिपाठी ‘शैल’

पतारी से सवा मील दूर दादुलाल का खेत था। अन्नू घर में ही था तो काम करने की दिक्कत थी नहीं। इसलिए दादुलाल जोतकर तिली छींट आया। बारी रूंधने का काम अन्नू के जिम्मे था। दूसरे दिन प्रातः ही वह इस कार्य हेतु निकल गया।

जेरिया काटकर मेढ़ पर रखी और दराती लेकर गड्ढा खोदने लगा। श्यामलाल की अहरी उसके खेत के समीप ही थी। तम्बाकू-सुपारी के बहाने वह अन्नू के पास चला आया। अन्नू उसको देखकर राम-राम किया और वापस काम में लग गया।

दोपहरी हो चली थी। एकाध जोरिया बच गई थीं। अन्नू सोचा शाम को लगा देगा और उनको घसीट के मेढ़ के किनारे रख दिया। श्यामलाल यह सब देख रहा था।

दरअसल, दादुलाल के खेत में वह अपनी भैंस डोरिया देता था। भूसा की फिक्र न रहती थी। परती जमीन थी। चारा उगता ही रहता। दादुलाल वृद्ध आदमी थे। खेती पाती अब कहां उनसे हो पाती थी। वो तो इस साल अन्नू घर में था तो कर लिया। ये बात श्यामलाल को चिंता में डाल दी थी। वह किसी कीमत में वहां खेती नहीं करने देना चाहता था।

दिन बीतने लगे। वह किसी तरह खेत को चौपट करने की जुगत में लगा था। लेकिन, सघन बारी लगी होने के कारण उसके मंसूबे कामयाब नहीं हो पा रहे थे। अब तो फसल के साथ-साथ चारा भी उग आया था। एक दिन रात में टेटबा खोल के भैंस को अंदर ढील दिया। देखते ही देखते कुछ पलों में सारा खेत तहस-नहस हो चुका था।

प्रातः काल अन्नू को खेत की दशा देखकर गश्त मार गया। दादूलाल किसी तरह बेटे को सम्हालते तो पत्नी की हालत खराब थी। वो किसी न्यायालय की तराजू के समान बस सब कुछ बराबर करने में लगे थे।

लव स्टोरी की भांति ये घटना भी ज्यादा दिन तक छिपी न रह पाई। छेदिया गांव के बाहर शिवघटा में रहता था। रात में उसने खेत में भैंस घुसी देखी थी। अब उसको मालूम हो गया था कि भैंस किसकी है?

उसने दादुलाल से एक का दून जड़ दिया। मामला प्रधान के पास गया। संध्या समय बजरंग बली के मंदिर के पास पंचायत बैठी। सभी को अपना पक्ष रखने को बोला गया। श्यामलाल बोला-‘प्रधान जी मैं पड़ोसी हूं। मुझसे ये घिनौना काम न होगा।’

बिना वजह मुझसे सवाल-जवाब किया जा रहा है। श्यामलाल ने कुछ भी न लिखे हुए परीक्षार्थी की कॉपी के रंग के समान श्वेत झूठ बोल दिया।

ददुलाल बस इतना ही बोले कि खेत के बगल में पड़ोसी श्यामलाल है और इसके अलावा दूर-दूर तक कोई नहीं है। इसलिए श्यामू को कहना पड़ा। मुझसे श्यामू की कोई दुश्मनी नहीं है।

अन्तिम निर्णय पंचों को लेना था। मामला पेचीदा था। पुख्ता कुछ भी नहीं था। जगत नारायण बोले-“पंच प्रधान अभी खेत चलें। न्याय वही होगा।”

भीड़ उलझन में थी कि ऐसा क्या होने वाला है। अब श्यामलाल भी घबरा रहा था। उसके मन में अब ये डर साफ था कि जगत नारायण अनुभवी हैं। वह पकड़ लेंगे।

हुजूम खेत पहुंचती है। जगत नारायण श्यामलाल से भैंस छोड़ने को बोले। खूंटा से गराव निकालकर जैसे ही नाद से बाहर लाया, भैंस उचट्टा मारकर खेत की ओर भागी। वह टेटबा के रास्ते अंदर जाकर चरने लगी। लोगों को अब सब समझ आ चुका था। भला भैंस को क्या मालूम कि टेटबा कहां है। चारा किस जगह है? ये तो उसको बार-बार खेत के अंदर घुसाने से ही उसने जान लिया।

पंचों ने फैसला सुनाया “चार कुरई गेहूं, ढाई कुरूवा कोदबा श्यामलाल हर्जाने के तौर पर दादूलाल को देगा।”

भविष्य में इस खेत की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी इसी की होगी।
भीड़ में तालियां बज गईं। मामला कितना भी फंसा क्यों न हो, न्याय देने के लिए दिमाग की जरूरत होती है। बड़ी-बड़ी दफाएं और किताबें पढ़ लेने से न्याय देना नहीं सीखा जा सकता। जगत नारायण जैसे लोग अगर आज की न्यायप्रणाली में आ जाएं तो शायद कचहरियां मुकदमों से भरी न रहतीं। आज देश की दुर्दशा संभवतः न्यायिक पिछड़ेपन की वजह से न होती।

(लेखक पंडित खुशीलाल शर्मा गवर्नमेंट ऑटोनोमस आयुर्वेदिक कॉलेज, भोपाल में अध्ययनरत हैं)

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