रक्षा का बंधन

समाज में कितनी बेटियों को आज के दिन केवल दहेज कम मिलने जैसी बातों से परेशान किया जाता है। उनको घर नहीं जाने दिया जाता। मुनिया तो अंत तक संभल गई। आज का परिवेश कितना संभलता है, ये सभी के समक्ष है।

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@शैलेश त्रिपाठी ‘शैल’

शैलेश त्रिपाठी ‘शैल’

शनिवार को ही विनोद ललिता को लेने झाली चला गया था। रामनिवास छह-सात दिन पहले ही बाहर से आए थे। राखी का त्योहार नजदीक था। अतः सोचते थे कि बहू-बिटिया सभी से मिलता जाऊं और विनोद को ललिता को लिवाने भेज दिया। ललिता भी राह ताक रही थी कि कब विनोद आएगा।
सुबह होते-होते वह वहां पहुंच गया। बहन किसी नव पुष्प के समान खिल गई। आंनद की सीमा ना रही। दो महीने बाद घर जो जाना था।

सास-ससुर से मिलने के बाद विनोद अंदर चला गया। ललिता ने नाश्ता-चाय कराया। घर-गांव की बातें होने लगीं। गाय ने बछड़ा दिया है। धौरा का जोड़ीदार बीमार है। बाबू कल ही मुझे जाने को बोल रहे थे। अमुधा वाली के घर में नाच-गाना हो रहा है, आदि तमाम तरह की बातें।

दोपहर हो चली थी। रसोई में खाना पक रहा था। बहन ने दार डाल रखी थी। मुगौरा बनने की तैयारी थी। घर के सभी वरिष्ठ जन भोजन पर बैठे। खाना-पीना हुआ। थोड़ी देर बाद विनोद ने गजाधर से बहन के साथ जाने की विदा मांगी।

गजाधर शांत स्वभाव के थे। लेकिन, उनकी पत्नी मुनिया अशांति की मिसाल थीं। जाने का नाम सुनते ही शुरू हो गईं-“टेपार में किलोभर दाल भी नहीं आई थी, बर्तन तो इतने थे कि मान जजमान में ही खतम हो गए। सेंत भरे लाला को ब्याह लिया।

कुछ भी नहीं दिया। बस लिवाने चले आते हैं।”

सच ही है। बेटी के ब्याह में बाप पूरी पूंजी दे डाले तो भी ससुराल वालों को कमी बनी रहती है।

स्वभाव के समान ललिता की आखों से अश्रु वर्षा होने लगी। वो अपने आगे ये सुनना पसंद कर लेती थी। लेकिन, भाई के सामने जब कहा, तब उसका धैर्य जवाब दे गया।

गजाधर किसी तरह मुनिया को समझाते हैं कि ऐसा ना करे। पर वो मरखहा बैल के समान अड़ गई। ना मानी सो ना मानी!

विनोद उधेड़बुन में फंस गया क्या? करे क्या, न करे? थोड़ी देर में नथुआ खबर लाया कि सिंहपुर वाले दामाद ने मुनिया की बेटी को आने से रोक लिया है। उन्होंने कहा है कि तभी भेजेंगे जब माता जी भी आएं और साथ में ले भी आएं। वो मुनिया की बेटी के व्यवहार से तंग आ गए थे।

शाम होते होते तक सिंहपुर वाले दामाद ही घर पहुंच गए। द्वार से ही चिल्लाना शुरू कर दिया। गांव के उत्कंठा युक्त गण्यमान्य उपस्थित होने लगे। माजरा समझने में लोगों को कोई खास मुश्किल नहीं हुई। लेकिन, विनोद को देखकर लोगों ने और ही गणित लगा डाली।

ललवा कोरी बोला कि ललिता को भेज देना उचित है। मुनिया की आदत से बेटी बिगड़ गई। अब बाहर के रिश्ते भी बिगड़ेंगे।
दान-दहेज किस्मत की चीज होती है। जितना मिला मिला बस!
मुनिया आपा खो बैठी वह सामूहिक रूप से दामाद और ललवा को गरियाना शुरू कर दी।अब बात बढ़ती जा रही थी। मौका देखकर दामाद ने भी शकुनि के समान पांसा फेंका और कहा कि ये वक्षनाग लड़की मेरे गले बांध दी, बिना किसी दान दहेज के।

शायद ऊपर वाले ने अब सुई मुनिया की ही ओर वापस फेर दी थी। जो ताने वो विनोद को दे रही थी, अब उसको ही उसी का दामाद दे रहा था।

गजाधर मौका देख के उठे। बोले-” भगवान से भी डरो! ललिता को भेज दो। तुम्हारी लालच ने आज एक भाई को बहन के सामने लाचार बनाकर खड़ा कर दिया है।”

महिलाएं जितनी गति से क्रोधित होती हैं, शांत भी उसी गति से होती हैं। मुनिया को किए का पछतावा होने लगा।

मन ही मन खुद को कोसने लगी। अंदर आई और ललिता को तैयार होने के लिए कहा। रास्ते के लिए पूरी बनाने बैठ गई।

सास-बहू दोनों गले मिलीं। अपने अश्रुओं से अंतर्मन को धो के निर्मल किया और वापस से प्रेम की बेल हरी हो गई।

समाज में कितनी बेटियों को आज के दिन केवल दहेज कम मिलने जैसी बातों से परेशान किया जाता है। उनको घर नहीं जाने दिया जाता। मुनिया तो अंत तक संभल गई। आज का परिवेश कितना संभलता है, ये सभी के समक्ष है।

(लेखक पंडित खुशीलाल शर्मा गवर्नमेंट ऑटोनोमस आयुर्वेदिक कॉलेज, भोपाल में अध्ययनरत हैं)

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