इसलिए मनाया जाता है रक्षाबंधन, मुहूर्त के चक्कर में न पड़ें, बहनें किसी भी समय भाई को बांध सकती हैं राखी

यह लेख जरूर पढ़ें, ताकि राखी को लेकर भद्रा और अन्य भ्रांतियों को दूर किया जा सके

senani.in

डिजिटल डेस्क

हिंदुओं के प्रमुख त्योहार रक्षाबंधन को लेकर तमाम आग्रह-पूर्वाग्रह हैं। किसी के मन में सवाल है कि रक्षाबंधन क्यों मनाया जाता है? तो हर बार जब यह त्योहार आता है, कुछ विद्वान राखी बांधने का मुहूर्त बताने लगते हैं। कोई कहता है कि शूर्पणखा ने रावण को भद्रा में राखी बांधी थी, इसलिए रावण मारा गया।

ऐसे सभी सवालों का जवाब दे रहे हैं ज्योतिषाचार्य डॉ सुधानंद झा। ये लेख सभी को जरूर पढ़ना चाहिए ताकि हिंदुओं के पर्व-त्योहार को लेकर फैलाई जा रही भ्रांतियों को दूर किया जा सके।

रक्षाबंधन इसलिए पड़ा नाम

रक्षाबंधन का त्योहार हर साल श्रावण मास शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। इस बार यह त्योहार तीन अगस्त को मनाया जाएगा।

आचार्य सुधानंद जी कहते हैं कि रक्षाबंधन के दिन साधक और विद्वान ब्राह्मण अपने देश, समाज और देशवासियों की सुरक्षा के लिए रक्षासूत्र की पूजा करते हैं। साथ ही हवन, मंत्र आदि के माध्यम से उन रक्षासूत्रों को सिद्ध करते हैं। फिर समाज के गणमान्य लोगों, पदाधिकारियों और वहां के प्रधान शासक को

“येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबल तेन त्वां प्रतिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल!!

मंत्र से उनके हाथों (कलाई) में वो सिद्ध रक्षासूत्र बांधते हैं। चूंकि, यह रक्षासूत्र समाज और देश की सुरक्षा के लिए बांधा जाता है, इसलिए इसको रक्षाबंधन भी कहा जाता है।

मूलतः ब्राह्मणों का पर्व

रक्षाबंधन मूलतः ब्राह्मणों का पर्व है, किन्तु इसे भाई-बहन के पर्व के रूप में भी जाना जाता है।

सवाल, जो हर बार उठता है

-क्या भद्रा में राखी बांधना चाहिए?

आचार्य डॉ सुधानंद झा के अनुसार-

भद्रायां द्वे न कर्तव्यौ फाल्गुनी श्रावणी तथा

अर्थात भद्रा में दो काम नहीं करना चाहिए, पहला फाल्गुनी अर्थात होलिका दहन और दूसरा श्रावणी अर्थात रक्षाबंधन।

चूंकि रक्षाबंधन ब्राह्मणों का पर्व है। इसलिए ब्राह्मण लोग जो अपने यजमानों को, समाज के गणमान्य लोगों, सैनिकों, पदाधिकारियों और शासकों को रक्षाबंधन बांधेंगे। चूंकि, रक्षासूत्र की सिद्धि की जाती है। इसलिए ब्राह्मण भद्रा में उपरोक्त को राखी नहीं बांधेंगे।

रक्षाबंधन पर भद्रा का विचार नहीं

आचार्य के अनुसार भाई-बहन का रक्षाबंधन पर्व दिन-रात मनाया जाएगा। उस पर भद्रा का कोई विचार नहीं होगा। अर्थात रक्षाबंधन पर दिन और रात किसी भी समय बहनें अपने भाइयों को सुविधा के अनुसार राखी बांध सकती हैं। आचार्य कहते हैं कि बहनें राखी बांधने के लिए किसी मुहूर्त के बारे में न सोचें। पूरा दिन शुभ होता है। विशेष परिस्थिति में बहनें रात में भी भाइयों को राखी बांध सकती हैं।

गलत कहानी

एक मनगढ़ंत कहानी चल रही है कि शूर्पणखा ने रावण को भद्रा में राखी बांधी थी। इसलिए रावण मारा गया।

आचार्य पूछते हैं कि ऐसी कहानी कहने वालों को क्या यह नहीं पता कि रावण को भद्रा में राखी नहीं बंधी जाती तो भी वह मारा ही जाता क्योंकि रावण को उसके कुकृत्यों के लिए मारा गया।

दूसरी बात ये है कि रावण के समय रक्षाबंधन भाई-बहन के पर्व के रूप में जाना ही नहीं जाता था। अपितु उस समय इसे ब्राह्मणों के पर्व के रूप में ही जाना जाता था।

आचार्य कहते हैं कि रावण अपने कुकृत्य और राक्षसी प्रवृत्ति के कारण मारा गया, न कि भद्रा में राखी बांधने से। इसलिए यह मनगढ़ंत कहानी कहने वालों से दूर रहिए।

इसलिए मनाया जाता है रक्षाबंधन का त्योहार

देवगुरु बृहस्पति ने की शुरुआत

सबसे पहले रक्षाबंधन देवगुरु बृहस्पति ने किया था। देवताओं को राखी बांधी थी और देवताओं ने विजय प्राप्त की थी।

… जब शची ने बांधी देवताओं को राखी

दूसरी बार जब देवासुर संग्राम हुआ और राक्षस विजयी होने वाले थे तो देवगुरु बृहस्पति भगवान के परामर्श पर देवराज इन्द्र की पत्नी शची ने रक्षासूत्र को आगे रखकर तपस्या की और देवताओं को अपना भाई मानकर उनकी कलाई पर राखी बांधी। फलस्वरूप देवताओं की विजय हुई।

माता लक्ष्मी ने बली को बंधी राखी

दूसरी कहानी है कि राजा बलि की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु पाताल लोक में उनके दरबार के रक्षक बन गये और अपना गोलोक, बैकुंठ धाम, स्वर्ग आदि भूल गए। इससे विधाता की सृष्टि में अव्यवस्थाओं का आगमन होने लगा। सृष्टि का भरण-पोषण असंभव हो गया। चारों तरफ त्राहि-त्राहि मचने लगी। तब माता महालक्ष्मी भगवान विष्णु को राजा बलि की भक्ति के मोहपाश से मुक्त करने के लिए पाताल लोक में गईं और राजा बलि को अपना भाई मानकर उनकी कलाई में राखी बांधकर उन्हें आशीर्वाद दिया कि मेरे राखी के प्रभाव से आपको कोई भी पराजित नहीं कर सकता है। आप और आपका साम्राज्य हमेशा सुरक्षित रहेगा। जब तक आप हमसे इसी श्रावण मास शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को राखी बंधवाते रहेंगे।

कहा जाता है कि उस दिन से आज तक राजा बलि अपनी बहन माता महालक्ष्मी जी से राखी बंधवाने और अपने राज्य को देखने पृथ्वी लोक आते हैं। माता महालक्ष्मी जी भी इस दिन अपने भाई राजा बलि को राखी बांधने श्रावण मास शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को पृथ्वी पर आती हैं।

…जब रानी कर्णावती ने हुमायूं को भेजी राखी

मार्च 1534 में गुजरात के शासक बहादुर शाह ने चितौड़ के नाराज सामंतों के कहने पर चितौड़ पर हमला कर दिया। राणा सांगा की पत्नी राजमाता कर्णावती को जब ये बात पता चली तो वे चिंतित हो उठीं। उन्‍हें पता था कि उनके राज्‍य की रक्षा केवल हूमायूं कर सकता है। इसलिए मेवाड़ की लाज बचाने के लिए उन्होने मुगल साम्राट हुमायूं को राखी भेजी और सहायता मांगी। रानी कर्णावती उस समय बहादुरशाह को हमले का जवाब देने में असमर्थ थीं। हुमायूं उस समय अपने राज्य के विस्तार में लगा हुआ था और बंगाल पर आक्रमण की तैयारी कर रहा था। रानी कर्णावती की राखी मिलने पर हुमायूं ने राखी की लाज रखते हुए तत्काल मेवाड़ के लिए कूच का आदेश दिया। हुमायूं ने मेवाड़ की ओर कूच तो कर दिया, लेकिन वह समय पर वहां पहुंचने में नाकाम रहा। इस कारण रानी कर्णावती ने किले की अन्य महिलाओं के साथ जौहर कर लिया। वहां पहुंचने पर हुमायूं को बहुत दुख हुआ। उसने बहादुरशाह को पराजित कर रानी कर्णावती के बेटे को मेवाड़ का शासक बना दिया। कहा जाता है कि उस समय से ही राखी बांधने की वर्तमान परंपरा शुरू हुई।

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