स्त्री

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सृष्टि की खूबसूरत अवतार हैं हम
तेज धार की बौछार हैं हम स्त्री
हमें फूल भी कह सकते हो
वक्त में आग की चिंगार हैं हम

आत्मा की जज्बातों को ललकारे,
उत्तर तेरी आंखों की वह आग हैं हम स्त्री
तपती जलती सुलगती संवेदना की सार हैं हम

टूटती, बिखरती, जलती बाती की तरह
एक पवित्र गंगा की मजबूत धार हैं हम

घाव की पीप बनकर तेरी आंखों
में लहुलूहान कर जाएंगे
हमें जो घायल करें
दरिंदों की जिंदगी की मौत
की तलबदार हैं हम स्त्री

मेरी ममता को शर्मशार गर तू करे
मिटा दे तेरे वजू़द को ऐसी हथियार, कटार हैं हम स्त्री
हां, सृष्टि की खुबसूरत अवतार हैं हम

@ अंकिता सिन्हा, युवा कवयित्री, जमशेदपुर

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