अन्नदाता की कहानी

कहानी प्याज की नहीं, किसी के जीवन की थी। आजीविका की थी। लेकिन, कितने लोग आज भी चिलीलाम जैसे हैं, जो मुसीबत में मदद का हाथ बढ़ाने के बजाय हाथ काटने की फिराक में रहते हैं और कितने बाबूलाल जैसे हैं, जो अपने काम को ईमानदारी और लगन से करते हैं। इतना सब कुछ होने के बाद भी परिस्थितियों का रोना नहीं रोया।

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@ शैलेश त्रिपाठी ‘शैल’

बाबूलाल रनेही गांव का एक मेहनतकश किसान था। बड़ी आपाधापी करके उसने इस वर्ष प्याज की फसल लगाई थी।

रेखा, रानी, चुनकवा, देवीदीन और घर के लगभग सारे सदस्य दिन-रात इस तरह लगे हुए थे, मानो लक्ष्मी इसी रूप में घर आ रही हों और सभी स्वागत के लिए बेचैन हों।

जेठ की तपन के बाद देर से ही सही, मेघों ने धरती को शीतल तो किया। लेकिन, प्याज बारिश में सड़ जाता है। ये कसक बाबूलाल को सोने न देती थी। बड़ा मुनाफा कमाने के चक्कर में खेत से सारा प्याज घर के पीछे रखवा दिया गया था। रखवाली करने के लिए कोई न कोई वहां हर समय रहता।

अइरा जानवरों का झुंड प्याज नष्ट करने को लालायित था। लेकिन इस घर की सजगता के आगे उनको मुंह की खानी पड़ती।
गोरू-बछरू से तो रक्षा हो गई। दैव से कौन कर पाएगा।

एक दिन जोर की आंधी में तिरपाल उड़ गया और बड़ी-बड़ी बूंदों का पानी ओसरिया में घुस गया। ऊपर की मचान को छोड़कर नीचे का प्याज किसी नाव की भांति पानी में तैरने लगा। घर में हाय-तौबा मच गया। सभी पानी उलीचने में लगे हुए थे। रानी को चेत न था। आंखों के सामने सारी मेहनत पानी में बही चली जा रही थी।

दुनियाभर के देवी-देवता सुमिर लिए गए। लेकिन, बाबूलाल की मदद के लिए शायद किसी के पास समय न था। आस-पड़ोस के भाई, दद्दा, कक्का सभी मदद के लिए आपदा राहत बल के समान लगे हुए थे।

बड़ी बोरियां उठाना मुश्किल हो रहा था। वो अंगद के पैर के समान हिल भी ना पा रही थीं।

जो मदद में थे वो बोरी रखवाने और पानी फेंकने में लग गए।
बचे लोग और मुहल्ले की महिलाएं संवेदना प्रकट करने और भगवान को कोसने के कार्य में जुट गईं।

पहली बार यहीं हर कोई ईमानदारी से काम कर रहा था।
बाबूलाल के घर में जगह का अभाव था। इसलिए कुछ बोरियां चिलीलाम के यहीं रखने का निर्णय सयाने लोगों ने किया। लेकिन, कितनी बोरियां वहां रखी गईं, इसका हिसाब न लगाया गया। बाबू लाल को ये बात पता न थी।

चिलीलाम कुख्यात बदमाश था। उसने इस आपदा को सुनहरे मौके के तौर पर देखा। सुबह होते-होते चिलीलाम तीन-चार बोरी प्याज गायब कर चुका था। बाकी बोरियां बाबूलाल के घर वालों ने लाकर वापस रख दीं।

थोड़ा बरबादी, थोड़ा चोरी और थोड़ा व्यवहार में प्याज रातभर में चला गया था। बचे प्याज पर अब सड़न ने डेरा डाल लिया था। बदबू से पूरा घर महक रहा था। रहना मुश्किल था। लेकिन, वो लोग छंटाई का काम प्रायः नित्य ही करते। कुछ ही दिनों में रानी को दमा ने जकड़ लिया। बाबूलाल भी उल्टी-दस्त करने लगा। बच्चों ने अस्पताल पहुंचाया। दोनों भर्ती कर लिए गए।

आजीविका के लिए चुना गया स्रोत जीविका को ही नष्ट करने का उपक्रम बनता जा रहा था।
जिस प्याज से उसको बच्चों के भविष्य के समान आशाएं थीं। आज उनको वह मूर्तिवत होकर निराधार देख रहा था।

कहानी प्याज की नहीं, किसी के जीवन की थी। आजीविका की थी। लेकिन, कितने लोग आज भी चिलीलाम जैसे हैं, जो मुसीबत में मदद का हाथ बढ़ाने के बजाय हाथ काटने की फिराक में रहते हैं और कितने बाबूलाल जैसे हैं, जो अपने काम को ईमानदारी और लगन से करते हैं। इतना सब कुछ होने के बाद भी परिस्थितियों का रोना नहीं रोया।

(लेखक पंडित खुशीलाल शर्मा गवर्नमेंट ऑटोनोमस आयुर्वेदिक कॉलेज, भोपाल में अध्ययनरत हैं)

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