घर की कलह

आपमें से अधिकांश बड़े होंगे, छोटे भी होंगे। लेकिन शादी के बाद आपको ही परिवार के प्रेम को जीवंत रखना है। आपकी पत्नी वही जानेगी, जो आप उसे बताएंगे। अन्यथा समाज के दुष्चक्र में फंसकर आपका भी घर बिखर सकता है।

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@ शैलेश त्रिपाठी ‘शैल’

Shailesh Tripathi ‘Shail’

रविकरण तीनों भाइयों में सबसे बड़े थे। दोनों बहनों का ब्याह कर दिया था। दद्दा और अम्मा की उम्र हो चुकी थी। रावेंद्र मझला और गुड्डा छोटा भाई अभी कुंवारे थे।

रविकरण बड़े भाई होने के नाते जितनी भी जिम्मेदारियां थीं, सबका बखूबी निर्वहन करते थे। उनका ब्याह ममता से हुआ था। ममता 13 वर्ष की एक सामान्य घर की लड़की थी। छोटा-बड़ा आदि का ज्ञान न था।

खाना बनाना, भैंस की गोबर- सानी और घर के सामान्य काम ममता कर लेती थी। बस उसमें एक ही बुराई थी। बिना बात के झगड़ते रहना। रविकरण ने इस बहस से हमेशा खुद को अलग रखा। पत्नी के पीछे परिवार में कटुता लाने का निंदनीय कार्य उनके बस के बाहर था।

समय बीतता गया। रावेंद्र का ब्याह पड़ोस के गांव बंडी में हुआ। जर जरजांत अच्छी-खासी थी। पर सम्हालने वाले की कमी थी। राम शिरोमण को डकैतों ने गोली मार दी थी। अतः समस्याग्रस्त परिवार को और अधिक परेशानियों में न डालते हुए रविकरण, दद्दा से कहकर रावेंद्र का ब्याह यथाशीघ्र ही कराने के पक्ष में थे।

ब्याह की तैयारियां शुरू हो गईं। नातमनी के लोगों का आना-जाना लगा रहता। रावेंद्र और सुनीता का ब्याह परिणय वेला में संपन्न हुआ।

रविकरण अब थोड़े फुरसत से हुए। खेती-बाड़ी का काम रावेंद्र ही देखते थे। लेकिन गल्ला बेचवाने का कार्य रविकरण ही करवाते थे। रुपया पैसा के लेन-देन का हिसाब भी वही करते थे। भाइयों के मध्य वैमनस्य की खाई अभी तक तो नहीं थी।

सुनीता रावेंद्र की पत्नी, जो अभी तक तीन-तेरह कुछ न जानती थी। उसे अब मायके वालों ने इस ज्ञान से परिपूर्ण करना शुरू कर दिया।

अपनी चीज ऐसे रखो। चूल्हा चौका अलग कर लो। खेती में आधा हिस्सा लो आदि।।।

बूंद-बूंद से तो सागर भर जाता है। पर वो तो सुनीता का दिमाग था। बूंद तुल्य बातों से वो भी अब तेजी से भरता जा रहा था।

सलाइन ड्रिप की भांति सुनीता अब धीरे-धीरे रोज चाटुकारिता पूर्ण बातों का डोज रावेंद्र को देने लगी।

एलोपैथी मेडिसिन के समान उसका असर भी तीव्र ही हुआ।अब रावेंद्र का व्यवहार बदलने लगा। खेती की अधिकांश चीजें चोरी होने लगीं। रावेंद्र को ताश खेलने में अब ज्यादा दिलचस्पी लग गई।

वैसे, ताश तो बहाना था। वास्तव में वो खेती बंद करना चाहते थे।

अब घर में कलह के बीज आरोपित होने लगे थे। सुबह शाम ममता और सुनीता में झड़पें होती रहतीं। भाइयों में अब भी एकता कायम थी। उनमें ऐसा कुछ नहीं हुआ।

पर ज्यादा दिन तक ये सब न चल सका। सुनीता ने भूख हड़ताल का सहारा लिया। घर को तोड़ने के लिए वो उतनी ताकत लगा रही थी, जो उससे हो रही थी। शाम का समय था। अंदर से एकदम लोटा-थाली फेंकने की आवाजें तीव्र होने लगीं।

आसपास की मुंडेरों से कई चेहरे इस दृश्य को रामलीला की भांति देखने को आतुर थे। वो अपने सारे आवश्यक कार्य, इस घर की बरबादी को देखने के लिए छोड़ देना उचित समझ रहे थे। हालांकि, उनका भी सुनीता को भड़काने में उतना ही हाथ था, जितना कि मायके वालों का।

रविकरण अब कुछ नहीं सोच पा रहे थे। इस परिस्थिति को सम्हालने की क्षमता जैसे उनमें शून्य हो गई थी।

अंततः फैसला हुआ। रावेंद्र अब खेती नहीं करेंगे। उन्होंने सुनीता और अपने बच्चों को साथ लेके कमाने हेतु इंदौर की राह ली। घर से सालभर का दाना-पानी भेजना मुकर्रर हो गया।

कुछ वर्ष बीत गए। खेती से आने वाली आमदनी अब सुंदरी के यौवन के समान घट चुकी थी।

इसी बीच मालहन से गुड्डा के लिए रिश्ता आया। उसका भी ब्याह यह सोच के करवा दिया गया कि अब शायद लक्ष्मी आएगी। लेकिन सूर्यास्त के बाद रात ही आती है। हां, चंद्रमा की रोशनी में अगर थोड़ा उजाला हो जाए तो वो बात अलग है।

कुछ दिन तक सब ठीक चला। लेकिन विनीता ने भी अपना असली रूप प्रकट करना शुरू किया। ससुर को अपनी तरफ मिला लिया। नित्य अम्मा को उनसे गाली दिलवाया करती।
उद्देश्य एक ही था कि यहां पर अब मेरी सार्वभौमिक सत्ता स्थापित हो जाए।

रविकरण की बेटी रागिनी अगर खाना न बनाए तो घर में कोई चूल्हा जलाने वाला तक न था।

जो परिवार कल तक संपन्न और खुशहाल हुआ करता था, वहां पर कुछ असामाजिक तत्वों की घुसपैठ ने उसको मलिन करके बरबादी के ढेर पर बैठा दिया था।

नित्य ही घर की कलह और आस पास के घरों से निकलते कटु शब्द रविकरण को इस कदर आहत किए कि वो अब मानसिक बीमारियों के साथ-साथ ढेरों शारीरिक बीमारियों के भी शिकार हो गए।

रावेंद्र को घर से इंदौर निकले हुए 12 वर्ष बीत चुके हैं। उन्हें आज भी बड़े भाई की फिक्र रहती है। जब कभी बड़े भाई की खराब तबीयत का समाचार मिलता है तो दुखी हो जाते हैं। खाना-पीना छोड़ देते हैं। भाई की वर्तमान स्थिति को सोचकर नित्य ही उनकी आखों में आंसू आ जाया करते।

गुड्डा भी द्वंद्व में फंसा हुआ था। पत्नी की सुने या भाई की देखभाल करे।

बड़े भाई का जो कर्ज था, उसे उतारता तो पत्नी के व्यंग्यात्मक वाक्य और धमकियां सामने आ जातीं कि-“कमाने नहीं जाते हो! बच्चों के भविष्य की चिंता नहीं है। यहां गोबर-खेती में दिल लगा के बैठे हो। अरे, जिसे मरना होगा वो तो मरेगा ही। तुम क्यों बेचैन हो”!

इसी समस्या में फंसे हुए वो बिना मन के घर के बाहर कमाने चला गया। अब घर में रविकरण अकेले हैं। जो रुखा-सूखा मिलता है, खा लेते हैं।

यदा-कदा जब भाई घर आते हैं तो कुछ पैसे दे जाते हैं। पर उनकी बीमारी की असली वजह क्या है।इस पर शोध करने का कार्य शायद अभी तक किसी ने न किया था।

यह कहानी एक ऐसे बड़े भाई पर आधारित है, जिसने अपने छोटे भाइयों के लिए कितनी मुश्किल से घर को सम्हाले रखा। भाइयों में आज भी एकता है। लेकिन घर की महिलाओं की कुबुद्धि के कारण आज घर की हालत कबाड़खाने जैसी हो गई है।

आपमें से अधिकांश बड़े होंगे, छोटे भी होंगे। लेकिन शादी के बाद आपको ही परिवार के प्रेम को जीवंत रखना है। आपकी पत्नी वही जानेगी, जो आप उसे बताएंगे। अन्यथा समाज के दुष्चक्र में फंसकर आपका भी घर बिखर सकता है।

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