… तो तेरा क्या जाता

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@ अंकिता सिन्हा

कुछ पल मेरे तसव्वुर में
ठहर जाते तो तेरा क्या जाता?
आगोश में मोम पिघल जाते
तो तेरा क्या जाता?

मुद्दत से हुई नहीं है तुझसे बात
गेसुओं में लिपट जाते
तो तेरा क्या जाता?

सूखे पौधे में अभी तो
जान आई थी
सावन गीत सुना जाते
तो तेरा क्या जाता?

खामोशी भी अब खता
करने लगी है
रूह बनकर समा
जाते तो तेरा क्या जाता?

कुछ पल मेरे तसव्वुर
में ठहर जाते
तो तेरा क्या जाता
तेरा क्या जाता?

अरमानों के घरौंदों ने
कोपलें सजाई हैं
अल्फाजों के मलहम लगा
जाते तो तेरा क्या जाता?

बादलों की ओट में दर्द छिप जाते
बारिश की सुखन अधरों
पर आते तो तेरा क्या जाता?

पीर भी मौसम की तरह बदले
मेरी कल्पना के गीतों मे
धड़कन की साज छेड़
जाते तो तेरा क्या जाता?

(#युवा कवयित्री, जमशेदपुर, झारखंड)

2 comments

  1. कत्तई बवाल लिखती हो जी ❣️ पूरा दिलो-दिमाग का सिस्टम हिल जाता है ☺️

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