जख्म-ए-दर्द

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@ अंकिता सिन्हा

जख्म-ए दर्द गम ही मिला हमें
सूखे आसूं तप ही मिला हमें

सूनी महफिल मुझे खल रही है
मेरा बादल बेवफा ही मिला हमें

हीर पीर सहा प्रेम अगन की
रांझणा झूठ दर्प ही मिला हमें

लहरें उठती मन की पीर लिए
टूटे शंख रेत ही मिला हमें

बोझिल नयन रो पडे़ देख तुम्हें
तन्हा सफर गम ही मिला हमें

‘अंकिता’ भी बिखर गई राहों में
धोखों की चादर ही मिली हमें

(युवा कवयित्री, जमशेदपुर, झारखंड)

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