लालच की खेती

समाज चालबाजों से भरा पड़ा है। ये स्वार्थ के सामने किसी को भी बर्बाद करने को तैयार हैं। ऐसे लोगों का समाज से बहिष्कार ही एकमात्र उपाय है।

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@ शैलेश त्रिपाठी ‘शैल’

बरसात शुरू हो गई थी। रामकिशोर के खेत में मतौवा लग रहा था। इस वर्ष धान लगाने का काम जोरों पर था।
मघा की बरसात से ही कुछ आशा थी।

बड़ी मुश्किल से बीज का प्रबंध करके रामकिशोर, नंदी के यहां भगे चले जा रहे थे। यही वो आदमी था, जो मदद करवा सकता था।

कांदा-कीचड़ में भला कौन रुचि रखता है। द्वार पर पड़े पर्दे से रामकिशोर अंदर झांका और आवाज दी-“नंदी भाई”!

“हां आ रहा हूं” अंदर से आवाज आई।

थोड़ी देर में नंदी बाहर आया, बीज की गठरिया ली, चबूतरे में रख दिया और रामकिशोर को अगले दिन काम का वादा दे दिया।

रामकिशोर बुजुर्ग इंसान थे। एक लड़का था, जिससे काम की उम्मीद लगाना पलास के पुष्प के समान व्यर्थ था। करने कथने वाला घर में कोई ना था। इसलिए पड़ोसियों से न चाहते हुए भी मदद लेनी पड़ती थी।

नंदी और गांव के अन्य रसूखदार लालच और छल के मावे में पगे हुए थे। रामकिशोर का आना उनके लिए जैसे सुनहरे मौके का आना था। वो वनराज के शिकार की भांति इस मौके को हाथ से नहीं जाने देना चाहते थे।

किसी तरह रामकिशोर की जमीन ले के आधा पौना ठास देके मामला रफा करना उनके दिमाग का आधी भरी गगरी के समान असंतुलित विचार था।

खेत जा के नंदी ने धान लगवा दी। बदले में 17 आने रामकिशोर ने दे दिए। पर उनको कहां पता था कि ये समस्या बरसाती बादल के समान वापस आ जाएगी।

नंदी भैयन ने रामकिशोर के लड़के को बहला लिया। अब वो प्रातः सायं शराब पी के घर में लड़ाई करता और खेत बेचने का दबाव बनाया करता।

रामकिशोर खेत बेच भी देते तो , घर में अन्न कहां से आता। अपनी सुख-सुविधाओं के लिए धरती मां का सौदा करना, उन्हें पराई स्त्री से प्रसंग करने के समान निंदनीय लगता।

घर में कलह के बीजारोपण का जो कार्य नंदी और उसके भाई पट्टीदारों ने किया, वो धान के बढ़ने की रफ्तार से भी तेज दिनोंदिन बढ़ रहा था।

दूसरे के घर में आग लगने पर हमेशा बगल वाला पड़ोसी ठंडक महसूस करता है। बिना इसकी परवाह के कि कल उसको भी ये दिन देखना पड़ सकता है।

रामकिशोर धीरे-धीरे उस ग्लानि से बीमार होते गए और आखिरकार एक दिन उन्होंने इस लोक से विदा ले लिया।

नंदी ने उनके लड़के को यह कहकर दुत्कार दिया कि खेत हमने बोआ है। हम ही काटेंगे। और हर साल जोतेंगे भी।

दद्दन पर तो जैसे बिजली गिर गई। वह उसे बेचकर पैसे चाहता था और जिसने ये ख्वाब दिखाया था, आज वही हृदय विदारक बातें कर रहा था।

वह चुपचाप घर लौट आया। बर्बादी के अलावा अब उसके पास कोई सम्पदा न बची थी। जिसको उसने अपने बाप की मृत्यु के बाद और बढ़ा लिया था।

आज रामकिशोर का लड़का दद्दन घर-घर मजूरी करता है। घर की हालत, सरकारी इमारत से भी जर्जर है। बड़ी मुश्किल से खाने का जुगाड़ हो पाता है।

समाज नंदी जैसे चालबाजों से भरा पड़ा है। ये स्वार्थ के सामने किसी को भी बर्बाद करने को तैयार हैं। ऐसे लोगों का समाज से बहिष्कार ही एकमात्र उपाय है।

(लेखक पंडित खुशीलाल शर्मा गवर्नमेंट ऑटोनोमस आयुर्वेदिक कॉलेज، भोपाल में अध्ययनरत हैं)

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