हां, तुम ही तो हो !

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तपती धूप मरूस्थल की जलन से
जैसे पांव थकते और कंठ प्यासी उबन में जलती
ऐसे में हमसफर की लालिमा
और उम्मीद सरिता देते हो !
तुम, हां तुम

गीतों के साज से तारों में उलझ
घायल उंगलियां और कांपती होठों की खामोशी
ऐसे रगमंच में रचे चोटी के कलाकार
राहत और आराम देते हो !
हां, तुम ही तो हो

खुदा की बंदगी में बेअसर
दुआओं की चादर
पथरी लकीरों की कड़ी में उलझी जिंदगी
हौसलों के सागर में गोताखोर भांति
किनारा देते हो!
हां, तुम ही तो हो

सपनों के पंखों का क्षत-विक्षत होकर
रंगीन आंसुओं में घुलने की अदा फिर
हौले से तकलीफों के लिफाफे
ऐसे विरानी पथ पर मंजिलों के निशान
हकीकत को सहारा देते हो !
तुम, हां तुम

कागज पर एक कश्मकश दासतां
और अलमारी में घुटती अकों की वजूद
चीरती भोर की फुटती सूरज की किरणों जैसी
मुट्ठी में धूल को समेटती
एक खूबसूरत मिट्टी का खिलौना फिर
जीने की सांसें भर देते हो!
हां, तुम ही तो हो

करवटों से लिपटी तकियों में घुलती काजल
पंखों से नयनों की आंख-मिचौली रूप
अशांत हृदय को मीठे बोल मिठास के पल
रातरानी रजनीगंधा की खुशबू देते हो!
हां, तुम ही

इंद्रधनुष में घुमिल सतरंगी अरमानों के बिखराव
शोक सृजन बांसुरी के धुन
तलाश अस्तित्व के दर्पण
ऐसे में मेरी हाथों में कलम देते हो!
प्रिय तुम, हां तुम

और मैं सृजनात्मक भाव में जीने लगती हूं
शब्दों से गढ़ती खुशियों को
शब्द कोषागार में
ढूंढती कविताओं को!

@ युवा कवयित्री अंकिता सिन्हा,
जमेशदपुर, झारखंड

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