काबिल फरिश्ते

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@ शैलेश त्रिपाठी ‘शैल’

है काबिल फरिश्तों की फेहरिस्त लंबी,
ना जाने फिर क्यूं सब ये बेरोजगार हैं
कंधों में जिम्मा और आंखों में सपने
लिए युवा अपना क्यों लाचार है

मिली उसको बस है, दुआओं की गठरी
मरता भी वहां, जहां हो रेल पटरी
तलाश में जीविका की कभी दिल्ली-पूना
है छोड़ जाता वो घर अपना सूना
क्या समझोगे मुश्किल-ए-हालात उसकी
लगी दांव पे है पूरी कायनात जिसकी

बनी दुनिया अब है, जरा थोड़ी दंभी
है काबिल फरिश्तों की जब फेहरिस्त लंबी

ये पूछो ना, कि मैंने ऐसा क्या देखा
मैंने वो देखा, जो तुमने ना देखा
खड़े थे स्टेशन पे मां, बाप, दादा
दिलाते थे याद उसको परिवार का वादा
कि जा, तू ही बस है जो अब कुछ करेगा
रो मत, तू एक दिन बहुत बड़ा बनेगा

हो गई थीं उस दिन की रातें भी लंबी
जब देखी मैंने काबिल फरिश्तों की फेहरिस्त लंबी

(लेखक पंडित खुशीलाल शर्मा गवर्नमेंट ऑटोनोमस आयुर्वेदिक कॉलेज, भोपाल में अध्ययनरत हैं)

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