विधवा

जब अपना आदमी नहीं रहता, तब एक स्त्री की कहीं कोई इज्जत नहीं रह जाती। सारे सम्मान आदर का मूल पति में ही था। जाते-जाते वो सब ले गया।

@ पंडित शैलेश त्रिपाठी ‘शैल’

senani.in

राम गोपाल ने आचार्य जी की बात मान ली। माघौटे ब्याह की तैयारियां शुरू कर दी गईं। अंकुर के पिता कांता प्रसाद सिंचाई विभाग में मैकेनिक थे। 12 रुपये महीने की तनख्वाह थी। खाने-पीने लायक जायदाद भी थी। दो भैंसें थीं। एक लगता और एक गाभिन।

भरा परिवार देख के रामगोपाल समधी बनने को तैयार हो गए। आचार्य जी की उपस्थिति में ब्याह करवा दिया गया। रमा घर से विदा हो गई।

कई वर्ष बीत गए हैं। सब कुछ सही चल रहा है। लेकिन, भाग्य का लिखा भला कौन मिटा सकता है।

खेत में कार्य करते समय पनीहा सांप ने अंकुर को काट लिया। दूर खेत में कोई पुकार सुनने वाला भी नहीं था। घर वाले जब तक जान पाते और खेत आते, तब तक यमराज उनको लेके जा चुके थे।

घर में चीख-पुकार मच गई। रमा को तत्काल रैगांव आने को पता भेज दिया गया। अचानक से समाचार पाकर वह घबरा गई। ना पढ़ने वाले विद्यार्थियों के भविष्य के समान उसको भी अपने भविष्य का भान होने लगा।
खुद को बहलाने लगी कि ऐसा कुछ नहीं होगा। हो सकता है कि कोई काम आ गया हो। अम्मा बीमार हो गई हों। दद्दा बीमार हो गए हों। आदि आदि…

मन चिंतन करता है, लेकिन खुद को फंसता देखकर उससे बचने का रास्ता भी खोज ही लेता है।

मुन्ना दादा रमा को लेके रैगांव की ओर निकल पड़े। आने वाली आंधी के समान रमा को रास्ते से ही इस घटना की सुगबुगाहट होने लगी थी।

दिल घबराया जा रहा था। ऐसा लग रहा था, मानो कोई अंदर ही अंदर काट सा रहा था।

वह घर पहुंचकर वही देखती है, जो अभी तक वो झुठलाए जा रही थी। कुछ ही पलों में वह अचेत होकर डेहरी पर गिर पड़ी।
जब तक उसको होश आता, लोग दाह संस्कार की तैयरियां करने लगे। दूर गांव के लोगों का जमावड़ा लगा हुआ था। हाथ में तुलसी दल और लकड़ी लिए लोग मिट्टी के बने खिलौने को उसी में मिलाने के लिए लगे हुए थे।

रमा की हालत पर भी व्याख्यान दिए गए।”ये अब क्या करेगी, किसके भरोसे रहेगी “आदि आदि…

लेकिन ये बातें पिंजड़े से निकले पक्षी के समान शीघ्र ही फुर्र हो गईं।

सुद्ध, सूतक, तेरही, बरखी आदि मरणोपरांत के उपक्रम करके लोग फिर से अपने काम-धंधों में वापस लग गए।
कितनी विडंबना है ना, श्मशान जा के भी लोग वहां की सच्चाई ना जान पाए।

कई दिन बीत गए। अंकुर की केवल दो ही निशानियां रमा के पास थीं। उसकी दो बेटियां, जो अभी नवजात स्वरूप ही थीं।

अब रमा की वो स्थिति ना रह गई, जो अंकुर के जिंदा थी। सास प्रातः सायं उसको ताने देती। कभी घर को लेके, कभी बाहर को, कभी काम धंधे को।

उसकी सास की नदी के समान वेगवती धाराप्रवाह कटु बातों को रोकने के लिए किसी के भी पास भावनाओं और समझाइश का बांध बनाने की क्षमता ना थी।

दिन सुनते-सुनते और रात अश्रु वर्षा करते काटने लगीं। बच्चियां अब बड़ी हो रही थीं। वो मां की हालत समझ रही थीं। लेकिन, बिना शस्त्र के योद्धा के समान वो कुछ भी ना कर पातीं।

मायके से अब तक जो सहारा मिल जाता था, अब वो भी जाता रहा। मुझे यहां रमा की कही वो बात याद आती है-“जब अपना आदमी नहीं रहता, तब एक स्त्री की कहीं कोई इज्जत नहीं रह जाती। सारे सम्मान आदर का मूल पति में ही था। जाते-जाते वो सब ले गया।”

सही ही तो है। स्त्री का मान सम्मान उसके पति के रहते ही रहता है। उसके बाद वह गुड़ की मक्खी के समान तिरस्कृत ही कर दी जाती है। समाज से परिवार से…

अब रमा अपनी बेटियों को पढ़ाने और उनके उज्जवल भविष्य की चिंता करते हुए, गांव के स्कूल में सफाई का काम करती है।
आचार्य जी ने हर जगह से कुछ पैसे इकट्ठा करवाकर उसकी लड़कियों के नाम पहले ही बैंक में जमा करवा दिए थे, ताकि ये बेटियां अब लावारिस जीवन ना जिएं।

आज के परिवेश में, इस घटना का चित्रण आपको कहीं भी मिल जाएगा। नारी सम्मान, नारी शक्ति की बातें किसी किताब में ही दबकर रह गई हैं।

(लेखक पंडित खुशीलाल शर्मा गवर्नमेंट ऑटोनोमस आयुर्वेदिक कॉलेज, भोपाल में अध्ययनरत हैं)

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