ठाकुर सूर्य प्रताप सिंह

वो समय जैसा भी रहा हो, लेकिन तब अपना भारत आज के समय से ज्यादा खुशहाल था। वो आत्मनिर्भर था। लोग स्वावलंबी थे। एक-दूसरे की मदद के लिए उत्साहित रहते थे।

@ शैलेश त्रिपाठी ‘शैल’

“ठाकुर सूर्य प्रताप सिंह राजपूत “मध्य प्रांत की दमोह रियासत के रसूखदार थे। घर में सम्मानित लोगों का उठना-बैठना बना ही रहता था। जघा-जमीन की कमी ना थी। भरा-पूरा परिवार था। सूर्य प्रताप के पिता जी उस क्षेत्र के वैद्य थे। अच्छे-अच्छे रोगियों को उन्होंने ठीक कर दिया था।

चार हरे की खेती भी होती थी। नौकर चाकर भी थे। सूर्य प्रताप प्रायः शाम को घूमने जाया करते थे।

संध्या का समय था। कौवे कांव- कांव करके घर लौट रहे थे। कुत्तों का झुंड आपस में जानवरों के समूह की तरह लड़ रहा था।
सूर्य प्रताप ये सब देखते हुए मेड़ पर से चले जा रहे थे। कुछ ही दूरी पर उनको किसी के चिल्लाने की आवाज सुनाई दी।

उन्होंने उस तरफ देखा। जहां से आवाज आ रही थी। दो लोग किसी अधेड़ उम्र के व्यक्ति को मारने के लिए दौड़े चले जा रहे थे। सूर्य प्रताप ने अपनी लाठी की पकड़ मजबूत की और इससे पहले कि वो अधेड़ भागता-भागता गड्ढे में गिरता, उनके बलिष्ठ हाथों ने उसको थाम लिया।

युवक सूर्य प्रताप को देखकर ठिठक गए। चौड़ी मूंछें, लंबा-चौड़ा शरीर था उनका। उनको देखकर मोहल्ले की महिलाएं अगर लड़ रही हों तो शांत होके अन्दर चली जाती थीं। “लल्ला आ रहे हैं “बस यही इसारा काफी होता था।

युवक इससे पहले कि लाठी भांजते। प्रताप की पहली लाठी उनकी ओर चल चुकी थी। हरिहर एक ही डंडे में गिर गया। दूसरा वाला प्राण बचा के भागा।

बुजुर्ग को घर लाया गया। लड़ाई वाली बात शीघ्र ही सावन की हरियाली के समान हर जगह फैल गई।

मामला सूर्य प्रताप के सामने आ चुका था। इसलिए इसको रफा- दफा करना मुश्किल था।

सांझ होते-होते बरगद के पेड़ के नीचे आस-पड़ोस के पंच-सरपंच आ चुके थे। गांव के बच्चों का झुंड इस को किसी उत्सव की भांति देख रहा था।

व्याख्यान और बयान शुरू होते हैं। मामला जमीन को लेके था। कल्लू अपनी जमीन बच्चे को पढ़ाने के लिए राजाराम को बेच चुका था। राजाराम ने 25 रुपये में सौदा तय किया था। 14 रुपये भी दे चुके थे। लेकिन, बचे पैसे देने का शायद इनका कोई इरादा नहीं था। कल्लू बार-बार पैसे के लिए आ रहा था। बच्चा ही उसकी सबसे बड़ी पूंजी थी। वो उसको पढ़ा-लिखाकर रियासत का दीवान बनाने को उत्सुक था। बीघा भर जमीन थी। बेटे की पढ़ाई के लिए वो भी बेच दी। मेधावी छात्र अपने साथ केवल बुद्धि लेके आता है। संसाधन तो उसको स्वतः ही जुटाने होते हैं।

कल्लू इस बार जब पैसा मांगने गया तो राजाराम ने अपने नौकरों से उसको पिटवाने का पूरा बंदोबस्त कर रखा था। पर ऊपर देर है, अंधेर नहीं। देर से ही सही सूर्य प्रताप से कल्लू की असमय मुलाकात हो ही जाती है।

दलील पेश हो चुकी थी। पल्ला कल्लू का भारी था। राजाराम को पैसे देने का करारनामा देना पड़ा।

पंचायत खत्म हो गई। सभी अपने अपने घर की ओर चल दिए। कल्लू की पत्नी ने दीया जलाया ही था कि कल्लू के आने की आहट हुई। वह दीये को पेउला में रखी और बाहर भागी।

“क्या हुआ, वहां'” पत्नी ने पूछा?

“लल्ला थे तो करारनामा लिख दिया है। कुछ दिन में पैसे भेज देंगे” कल्लू बोला।

दोनों के बीच कुछ समय के लिए परीक्षा हॉल की भांति शांति छा जाती है।

राजाराम इतनी आसानी से पैसे नहीं देगा। ये बात सूर्य प्रताप जानते थे और बच्चे को पैसा भेजना आवश्यक था।

आकाश में तारे टिमटिमा रहे थे। मार्ग सुनसान था। खेती-बाड़ी की बात हुक्का के तम्बाकू के साथ ही समाप्त हो चुकी थी। एकाध जगह कुछ लोग अलाव तापते नजर आ जाते थे।

सूर्य प्रताप कल्लू के घर की ओर भागे चले जा रहे थे। द्वार पर देखा तो तीन कच्ची दीवारें थीं। सामने कांटों का टेटबा लगा हुआ था। ऊपर घास-फूस और पुआल की छत पड़ी थी। द्वार पर एक बैल बंधा था। दूसरा बैल का जोड़ीदार बीमारी में मर गया था।

“कल्लू”… प्रताप ने पुकारा

चिर परिचत स्वर था। कल्लू उठ बैठा, बाहर आया और आश्चर्य भाव में बोला

“लल्ला आप”…अभी यहां

वास्तव में वो इसलिए आश्चर्य था कि इतने धन धान्य वाले बड़े आदमी को बैठाए कहां?
घर में धान का पैरा रखा था। उसी में बुढ़िया और कल्लू सोते थे। लड़का बाहर पढ़ाई कर रहा था।वह क्वांर से घर नहीं आया था।
प्रताप अनुभवी व्यक्ति थे। वे कल्लू की यथास्थिति को भांप गए थे।

उन्होंने कहा -” करारनामा हुआ तो है, पर राजाराम पैसे दे ही देगा ये बहुत मुश्किल है”। तुम बच्चे को कल की डाक से ही पैसे भिजवा दो।

सूर्य प्रताप ने अपनी परदनी की कमर की गांठ से पांच रुपये निकाले और कल्लू को पकड़ा दिए।

“कल्लू ये रखो, इसके बदले तुम को कोई बेगारी या गुलामी नहीं करनी है। बस तुम्हारा बच्चा पढ़ ले यही हमारी कामना है।”

कल्लू हाथ जोड़े अवाक और स्तब्ध खड़ा रह गया।

प्रताप ने पैसे पकड़ा के अपनी राह ली। उनकी धमनियों में रक्त नहीं बल्कि करुणा, प्रेम, दया की त्रिवेणी बहती थी।

गरीब की दुर्दशा देख के उन्होंने अपनी जमा-पूंजी उसको दे दी।

वो समय जैसा भी रहा हो, लेकिन तब अपना भारत आज के समय से ज्यादा खुशहाल था। वो आत्मनिर्भर था। लोग स्वावलंबी थे। एक-दूसरे की मदद के लिए उत्साहित रहते थे।

आज के पूंजीवादी समय में ठाकुर सूर्य प्रताप सिंह राजपूत जैसे निश्छल लोग विरले ही होते होंगे।

(लेखक पंडित खुशीलाल शर्मा गवर्नमेंट ऑटोनोमस आयुर्वेदिक कॉलेज, भोपाल में अध्ययनरत हैं)

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