बस की सवारी

आखिर मेरे देखते-देखते कंडक्टर सरकार और विभाग के लगभग सारे रोल अदा कर चुका था।

@ शैलेश त्रिपाठी ‘शैल’

बात उन दिनों की है, जब मैं प्रयागराज में रहता था। राखी का त्योहार था तो घर वालों ने बुलाने की थोड़ी हिमाकत कर ही दी।

मुझे संदेश भेजा गया कि राखी आ रही है। मम्मी मामा के यहां जाएगी। अतः घर में भैंसों के गोबर और झाड़ू-पोछा करने के लिए तुम्हारी अत्यंत आवश्यकता है।

घर जाने का जुनून आशिकी से भी ज्यादा सवार था। इसलिए इन बातों की परवाह न थी।
झोला बांधा, तौलिया डाली। चार यार दोस्त स्टेशन तक छोड़ने भी आ गए। लगाव तो ऐसे दिखा रहे थे, मानो मेरे बिन रह ही ना पाएंगे।

गाड़ी किसी कॉलेज के विद्यार्थी के समान लेट ही आई। पर आ गई। यही खुशी की बात थी। उन दिनों घर के झगड़े की खुन्नस भी रेल पे उतारी जाती थी, उसको निरस्त करके।

ये रहीं राजकाज की बातें। पांच-छह घंटों में गाड़ी चीखती-चिल्लाती हुई गंतव्य तक आ ही गई। अब आगे क्या होगा?

राम जाने,

मैं तो उतर आया।

आठ बजे एक बस मझगवा जाती थी। उसके मिलने की आशा थी। बाकियों की आशाएं तो चिकित्सा शास्त्र वालों के परिणाम की भांति टूट गई थीं।

बस आई। उसके हाव भाव से ऐसा लगा, मानो अस्पताल से कोई रोगी आया हो। उसमें पैरों को रखने की भी जगह नहीं थी। फिर भी कंडक्टर

खाली है, खाली है

के नारे लगा रहा था। भारत की जनसंख्या बढ़ती ही जा रही है, फिर भी लोकसभा में कुछ सीटें तो खाली ही हैं।

पर हां, वहां का कंडक्टर बस के कंडक्टर की भांति नहीं चिल्लाता।

आखिरकार किसी लकड़ी के गट्ठर के समान मुझे भी उसमें ठूंस दिया गया। बस के अंदर का दृश्य किसी निर्वाचन क्षेत्र की भांति प्रतीत हो रहा था। सीटें तो सीमित थीं, पर दावेदार बहुत थे।

जो खड़े थे वो अनुनय विनय का सहारा ले रहे थे, ताकि कैसे भी करके एक सीट तो जीत ही जाएं। लेकिन, जो बैठे थे वो अपने चीख मचाते बच्चों और पान खाए पतियों को बैठाने में प्रिफरेंस दे रहे थे।

सही ही है, नेता कुर्सी पाने के बाद कुछ ऐसा ही करते हैं।

अंततः चुनाव हो गया। सीट जिनकी थी, वही बैठेंगे। बाकियों को बिना शादी हुए युवकों की भांति खड़े रहने का आदेश जारी हो गया।

लोकतंत्र था, कभी न कभी सीट तो मिलती ही, इस पार्टी से नहीं तो अगली। बस यही बोध लगाकर लोग खड़े रहने को राजी हो गए।

बस स्टार्ट करने की जुगत शुरू हुई, वो संसद की तरह विपक्ष के हंगामे के बाद बार-बार बंद हो जाती थी।

अंदर लोग बेहाल हो रहे थे। आधों को उतर जाने का फरमान जारी हो गया। मानो वही बस शोर कर रहे थे। उनको बस को धक्का लगाने का कार्य दिया गया। यहां भी संसद के समान समानता थी। नर नारी लगभग बराबर अनुपात में उतारे थे। काफी मान-मनौवल के बाद लोग धक्का लगाने को राजी हो गए।

एकता छलक पड़ी थी । स्त्री, पुरुष, बच्चे, सभी धक्का लगा रहे थे। ऐसा लग रहा था मानो काफी आर्थिक मंदी के बाद देश को आगे बढ़ाने के लिए धकेला जा रहा हो।

अंततः तपस्या की भांति अथक परिश्रम के बाद बस स्टार्ट हो जाती है।

अब नई समस्या प्रकट हो गई

जो धक्का लगाने के लिए उतरे थे, उनकी सीटों में पास में खड़े लोग बैठ गए थे। लोग किसी हारे हुए नेता के समान खिसियाए जा रहे थे फिर कंडक्टर को बुलाया जाता है। होम मिनिस्ट्री की भांति अब उसने ये आदेश निकाल दिया कि जो लोग अंदर थे। वही बस सीट में बैठें। बाकियों को बस से उतार दिया जाएगा।

बस से कैसे उतार दोगे
क्या हम पैसे नहीं देते-एक बुजुर्ग बोले

हो सकता है, वो टैक्स की बात कर रहे हों। भई ये भी तो एक देश ही था।

यहां कंडक्टर ने बड़े संतुलित और नवाबी अंदाज में जवाब दिया कि महिलाएं जब तक अपने बच्चों को गोदी में नहीं बैठतीं, बस आगे नहीं चलेगी।

महिला संगठन को ये अपना अपमान लगा। वह महिला आयोग की भांति वहां चर्चा परिचर्चा पे उतर आईं।

कंडक्टर अब सुप्रीम कोर्ट का जज बन गया, उसने बोला-बस हमारी है। यहां सबके साथ बराबर का व्यवहार होगा।

कुछ पल के लिए लगा कार्यपालिका और न्यायपालिका में टकराव हो जाएगा, पर हमेशा की तरह जीत न्यायपालिका की हुई।

महिलाएं अपने बच्चों को गोदी में बिठाने पे राजी हो गईं। अब सरकार यानी बस आगे को बढ़ने पे राजी हुई।

हिरौंदी आते-आते नई समस्या ने जन्म ले लिया। एक माता के उपद्रवी पुत्र ने एक सज्जन स्वरूप भले मानुष के उपर पेशाब कर दिया। कपड़े से रंग और गंध का मिश्रित स्वरूप दिखने लगा। सज्जन छटपटाने लगे। वो अपने ऊपर लगी गंदगी को इस कदर साफ करने पे उतारू थे, जैसे भ्रष्टाचार का दाग लग गया हो।

महिला और सज्जन में द्वंद युद्ध की स्थिति आते देख कंडक्टर यूनाइटेड नेशन की भांति बीच में आ गया। समझाइश देने के बाद भी मामला न बनता देख पश्चिमी देशों के राष्ट्रपतियों के समान उन दोनों देशों को/मेरा मतलब सवारियों को उस जगह से उठाकर अन्य दो को वहां बैठा दिया।

सीट तो जा चुकी थी। इसलिए शक्तिहीन हो जाने के अब दोनों ही शांत खड़े थे और ऐसा व्यवहार कर रहे थे, मानो कुछ हुआ ही ना हो।

लोग किसी चुटकुले की भांति मजे लेकर वापस सफर के आनंद में भाव विभोर होने लगे।

एक ने खिड़की से नीचे मुंह में आए तंबाखू की गंदगी को थूका। लेकिन वो राजनीति के दोष के समान उड़कर पीछे वाले पे पड़ गया। आरोप प्रत्यरोप का दौर शुरू हो पाता कि दोनों को सीट चली जाने का भय दिखा दिया । दोनों ही शांत हो गए। नेता जी की भांति सीट से लगाव तो दोनों को ही था।

सफर थोड़ा सा और बचा ही था कि बीच के रास्ते में एक नींबू व्यापारी बोरी भर नींबू लिए चढ़ा। किराये को लेके फिर किच -किच हो गई।

पुराना वाला इतना ही लेता था। व्यापारी बोला
हो सकता है वो पिछली सरकार की बात कर रहा हो।

तो उसमें ही जाओ। कंडक्टर बोला। वो नई सरकार की नीतियों की भांति बोल रहा था।

अंत में दोनों में एक द्विपक्षीय गुप्त समझौता हो जाता है। बारह रुपये नकद के अतिरिक्त छह नींबू भी व्यापारी ने दिए। कंडक्टर यहां पर विदेश और वाणिज्य मंत्रालय तथा वस्तु विनिमय प्रणाली दोनों को जीवंत करते हुए दोनों के ही कार्य कर रहा था।

मेरा स्टॉपेज आ जाता है, ये तमाशा देखकर मन तो भरा नहीं था। अश्लील विचारों के समान बार-बार मन वहीं भाग रहा था।

आखिर मेरे देखते-देखते कंडक्टर सरकार और विभाग के लगभग सारे रोल अदा कर चुका था।

(लेखक पंडित खुशीलाल शर्मा गवर्नमेंट ऑटोनोमस आयुर्वेदिक कॉलेज, भोपाल में अध्ययनरत हैं)

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