खानपान में बरतें ये सावधानी, भीष्म पितामह ने अर्जुन को दिया था ज्ञान

भीष्म पितामह ने गीता में अर्जुन को चार प्रकार के भोजन के बारे में बताया था। साथ ही कुछ सावधानियां भी बरतने की सलाह दी थी

senani.in

डिजिटल डेस्क

हर मनुष्य चैन की दो रोटी खाना चाहता है। इसके लिए वो आजीवन विभिन्न प्रकार से संघर्ष करता है। लेकिन, कई बार दिनभर मेहनत के बावजूद व्यक्ति को भरपेट भोजन नहीं मिलता या दुर्भाग्य उसका पीछा नहीं छोड़ता है।

ऐसे लोगों की समस्या का कारण और समाधान भीष्म पितामह ने अर्जुन को बताया था। पितामह ने बताया था कि थोड़ी सी सावधानी से मनुष्य अपना दुर्भाग्य टाल सकता है।

पितामह ने कही थीं ये चार बातें

-जिस भोजन की थाली को कोई लांघकर गया हो, वह भोजन की थाली नाले में पड़े कीचड़ के समान होती है।

-जिस भोजन की थाली में ठोकर लग गई या पांव लग गया, वह भोजन की थाली भिष्टा के समान होती है।

-जिस भोजन की थाली में बाल पड़ा हो, केश पड़ा हो, वह भोजन दरिद्रता के समान होता है।

-अगर पति और पत्नी एक ही थाली में भोजन कर रहे हों तो वह मदिरा के तुल्य होता है।

…और सुनो अर्जुन अगर पत्नी-पति के भोजन करने के बाद थाली में भोजन करती है, उसी थाली में भोजन करती है या पति का बचा हुआ खाती है तो उसे चारों धाम के पुण्य का फल प्राप्त होता है। चारों धाम के प्रसाद के तुल्य वह भोजन हो जाता है।

बेटियां हर लेती हैं पिता की अकाल मृत्यु

… और सुनो अर्जुन, बेटी अगर कुमारी हो और अपने पिता के साथ भोजन करती है। एक ही थाली में उस पिता की कभी अकाल मृत्यु नहीं होती क्योंकि बेटी पिता की अकाल मृत्यु को हर लेती है।

इसीलिए बेटी जब तक कुमारी रहे तो अपने पिता के साथ बैठकर भोजन करे। क्योंकि वह अपने पिता की अकाल मृत्यु की आशंका को खत्म कर देती है।

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