अपमान

हर बार दोष अपनी औलाद का ही नहीं होता। दोष पराई औलाद में भी हो सकते हैं। नजरिया बदलें। एक ही चश्मे से सब कुछ देखना विभ्रमित कर सकता है।

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@ शैलेश त्रिपाठी ‘शैल’

पुरुषोत्तम पंडित तीसरे मोहल्ले के सबसे ज्ञानी और प्रतिष्ठित व्यक्तित्व थे। घर में तीन लड़के थे। बड़े लड़के का आकस्मिक देहांत हो चुका था। बचे दो आज अच्छी जगह पर हैं।

पूजा-पाठ आदि के अलावा पुरुषोत्तम खेती भी करते थे। लड़के भी बाप के साथ राजा की सेना की भांति खेती-बाड़ी में पीछे-पीछे लगे रहते थे।
अच्छा खासा घर बार था। चार भैंसें भी थीं। दो हरे की खेती भी होती थी।

संध्या हो चुकी थी। पुरुषोत्तम कपड़े बदलकर संध्या आरती करने को तैयार हो रहे थे। चबूतरे पर डब्बी जुगुर-जुगुर जल रही थी।

भाई !..भाई!
द्वार पर कोई जोर-जोर से चिल्ला रहा था। बड़ा लड़का बाहर आया। पड़ोस के गांव के लक्ष्मी दास खड़े हुए थे। उसने उनके पैर छुए। बैठने को खटिया निकाली। हालचाल पूछा।

“दद्दा संझबाती कर रहे हैं”- लड़का बोला।

“अरे ठीक है। कर लेने दो”
लक्ष्मी दास बोले।

थोड़ी देर में अंगौछा लपेटे पुरुषोत्तम बाहर आ गए। दोनों ने भेंट की और बैठकर देश दुनिया की बातें करने लगे।

“खेरबा आया था। लाला बनिया की बेटी की शादी थी। सोचा जाते जाते यहीं तुमसे भी मिलता चलूं।”

“अरे धन्यभाग”…पंडितजी बोले।

पुरुषोत्तम…

हां लक्ष्मी दास बोलिए…

“ये जो तुम्हारा बड़ा लड़का है। इसका ब्याह गोकुल की बिटिया से करवा दें? क्या कहते हो।”

“जैसा आप सही समझिए”…

गोकुल लीलापुर के ताल्लुकदार थे। उनकी बेटी खुद से बोर के पानी भी नहीं पीती थी। घर में तो जैसे उसी का इन्द्र की भांति राज्य चलता था। बड़े-छोटे की कद्र बिल्कुल ना थी। ढिठाई समुद्र की गहराई के समान अंतहीन थी।

पुरुषोत्तम स्वभाव के बहुत नरम थे। वैसे ही उनके दोनों बेटे भी थे। पत्नी को मरे कई बरस बीत गए थे। यही तीनों मिल के एक-दूसरे के साथ सुख-दुख बांट लेते थे।
लेकिन भला घर में स्त्री के अलावा कोई चूल्हा ढंग से जला पाता है क्या?

अतः बस इसी कमी के कारण वो बड़े बेटे का ब्याह शीघ्र ही कर देना चाहते थे।
विधि का विधान कहिए या अनहोनी, लक्ष्मीदास वहां इस विषय पर पैगाम लिए कबूतर की भांति आ गए।

उन दिनों लड़का को लड़की देखने का रिवाज नहीं था। अतः भाग्य के भरोसे पुरुषोत्तम के बड़े बेटे का विवाह गोकुल की बेटी घम्मी से हो गया।

कुछ दिन बीतते हैं। घम्मी अपनी आदतों पे आती है। अब घर को शांति के स्थान पर कलह ने कब्जिया लिया था।

रोज सुबह-शाम बस घर में झगड़ा मचा रहता। कभी खाना बनाने को लेके तो कभी बर्तन मांजने को। वजहें स्पष्ट थीं। जिनका कोई ओर-छोर नहीं था। वे भी अब महत्वपूर्ण होती जा रही थीं।

सही ही है, घर बिखरने से पहले छोटी-छोटी बातें ही बड़ी-बड़ी बनने लगती हैं और एक दिन किसी व्याधि के समान उपद्रवी हो जाती हैं। सब कुछ कलह की भेंट चढ़ जाता है।

पुरुषोत्तम गांव में तमाशा नहीं बनने देना चाहते थे। अतः वो शांत रहने में भलाई समझते। बाप की शांति से बेटा भी सीख ले रहा था। वो भी चुप ही रहता।

ये सब ज्यादा दिनों तक नहीं हो पाया। बहू पति पर हावी होने लगती। बात अब अलग होने पे आ गई थी। विवाद और ना बढ़े इसलिए पुरुषोत्तम राजी हो गए।

घर में गगरी, घैला, चिमटा, दरी, बिछौना, खटिया, भैंस आदि बंटवारे की वस्तुएं, बहू की नज़रों में अमूल्य और बेशकीमती चीजें थीं। जिनको लेके शायद वो गोरों की भांति धनवान हो जाती।

बंटवारा हो गया। पुरुषोत्तम की रोटी अलग बनने लगी। बेटा बाप को यदा-कदा बीती रात छुप के खाना खिला आता था। बहू कैसी भी रहे बाप-बेटे का प्रेम आबे में पकी ईंट के समान पक्का था।

वो खुलकर पिता के सामने नहीं आ पा रहा था। बहू की धमकी बहुत ही प्रचंड जो थीं।

पर प्रेम कहां ज्यादा दिनों तक छुपने वाला था। बुरे व्यक्तित्व के चरित्र की भांति ये भी बहू को शीघ्र ही पता चल गया।
अब पुरुषोत्तम घर से निकाल दिए गए हैं। उनका लड़का पत्नी के सख्त शिकंजे में है। कभी-कभार छुप-छुपकर बाप से मिल आता है। दोनों अपने-अपने अश्रुओं से इस शिकवे को पसीने की भांति निकाल देते हैं।

गांव के तालाब के किनारे शिव मंदिर है। पुरुषोत्तम वहीं सोते हैं। भीख मांगकर जो भी खाना मिला खा के जीवन यापन कर रहे हैं।

हर बार दोष अपनी औलाद का नहीं होता। दोष पराई औलाद में भी हो सकते हैं। नजरिया बदलें। एक ही चश्मे से सब कुछ देखना विभ्रमित कर सकता है।

समाज में पुरुषोत्तम जैसे लोगों की स्थिति का कारण आज की ही नाममात्र की जागरूक युवा पीढ़ी है।

(लेखक पंडित खुशीलाल शर्मा गवर्नमेंट ऑटोनोमस आयुर्वेदिक कॉलेज, भोपाल में अध्ययनरत हैं)

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