भूत और वर्तमान

बाजारों में दुकानदार बहुत हैं। आपमें से भी कई होंगे। बस आप सोचिए कि आपमें से कितने सेठ अरुण प्रसाद हैं। उनकी भावना आपके दिलों में कितनी जीवंत है।

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@ शैलेश त्रिपाठी ‘शैल’

सेठ अरुण प्रसाद चंगेरी के नगर सेठ थे। बाजार में उनकी दो दुकानें भी थीं। भरा परिवार था। दो लड़के और एक लड़की थी। लड़की का उन्होंने ब्याह कर दिया है। उनके बड़े बेटे चांगेरी रियासत में मुंसिफ हैं। छोटे अभी अध्ययन के लिए भोपाल में बसे हुए हैं।

तिथि त्योहार ही घर में सभी का मिलना हो पाता था। काम के सिलसिले में सभी अधिकतर बाहर ही रहते थे।

मकर संक्रांति नजदीक आ रही थी। बाजार में पहले से ज्यादा चहल-पहल थी। दूर-दराज के गांव से लोग खरीदारी के लिए आ रहे थे। प्रभात का समय था। सेठ जी दुकान पर ही बैठे थे। पास की दुकान में नौकर श्यामू था। मुख्य दुकान पे खुद सेठ जी बैठे हुए थे।
एक किसान जिसके सिर पे मैली पगड़ी है। पैरों में जूते का आभाव था। हाथ में जूट का एक थैला था। हाव-भाव से तो ग्राहक ही लग रहा था। लेकिन शायद बाजार देखकर भ्रमित था कि क्या खरीदे और क्या नहीं।
कभी थैला सम्हाल रहा था तो कभी खीसे में पड़े कुछ पैसे।

सेठ जी ने आवाज लगाई -आ जाओ, क्या लोगे?

किसान हड़बड़ा गया। हाथ जोड़ता हुआ बोला-पावभर गुड़ और पावभर ही तिली, सरकार।

ठीक है, आओ-सेठजी बोले

दोनों की कीमत सवा बारह आने तय हुई। पर उसके पास पूरे पैसे नहीं थे। लाचारी से मुस्कुराकर वह ज्यों ही चलने को हुआ।
सेठजी ने आवाज लगाई-सुनो भाई ऐसे निराश मत हो, ले जाओ, आओ।

किसान आत्मसम्मानी था। वह ना तो सेठजी को धंधे से सौदे करने की अनुमति दे पा रहा था और ना ही सेठ जी की करुणा से अलग हो पा रहा था।

अंततः ऊहापोह समाप्त हुआ। जीत करुणा की हुई। किसान लौट आया।
सेठ जी को उसके बारे में जानने की उत्सुकता हुई।

कहां रहते हो…

मेहुती में सरकार…

घर में कौन-कौन हैं?

बेटा है, बहू है, डेढ़ साल का नाती है।

अच्छा तो उसको तिली के लड्डू खिलाने हैं? सेठजी हंसे।

हां, सुबह से बच्चा रोए जा रहा है। पड़ोस के बच्चों के हाथ में लड्डू देख के सारा घर सिर पर उठा लिया है।

उसी के लिए यहां आया हूं।

पर सारी चीजें महंगी हैं। मेरी इनको खरीदने की बिसात नहीं थी। इसलिए बस सब देख रहा था।

… और बिना कुछ लिए घर भी चले जाते। नाती को क्या बोलते?
सेठजी बोले

किसान बोला-नाती से झूठ बोल देता कि बाजार में सामान मिला ही नहीं या चोरों ने आते समय सब लूट लिया।

सेठ जी उसकी हालात पर पसीजे जा रहे थे। मानो गरीबी और लाचारी का इतना विस्तृत चित्रण आज तक किसी ने उनसे ना किया हो।

वो तिली-गुड़ भूल जाते हैं। बस सत्यनारायण भगवान की कथा के समान किसान की बातें सुनते रहते हैं।

सरकार… फसल को सूखा निगल गया। रहा-सहा साहूकार ले गया। अब तन पे कपड़े बचे हैं और ये पेट जो खुद को भरने के लिए सुराही के समान लालायित ही रहा आता है।

जो थोड़ी बहुत जायदाद थी, वो रियासत में चली गई। बेटे-बहू मजदूरी करते हैं। बूढ़ा होने के कारण रोज तो ना सही पर कभी-कभी मैं भी जाता हूं। पत्नी उपचार ना मिलने के कारण बीमारी से मर गई।

उसने ऊपर देखा और कहा कि अब ऐसे ही जीवन चल रहा है।

उसकी मर्जी है। जब तक चलाए। गला रूंध आया और महिलाओं की भांति आंखें अश्रुपूरित हो गईं।

सेठजी ने उसको त्योहार का सारा समान दिया। कमीज सिलवाने के लिए कपड़ा भी दिया। एक नारियल देकर बोले
-आप मेरे पिता तुल्य हैं। आपसे पैसे लेके मां की कोख को क्यूं लजाऊं। मैंने भी जीवन ऐसी ही दशाओं में जिया है। गरीबी क्या होती है, करीब से देखा है। आपमें मुझे मेरा भूतकाल दिख गया।

सेठ जी की बातों में करुणा थी। किसान की बातों में संतोष था। दोनों एक ही थे। बस वर्तमान और भूत का फर्क था।

बाजारों में दुकानदार बहुत हैं। आपमें से भी कई होंगे। बस आप सोचिए कि आपमें से कितने सेठ अरुण प्रसाद हैं। उनकी भावना आप के दिलों में कितनी जीवंत है।

(लेखक पंडित खुशीलाल शर्मा गवर्नमेंट ऑटोनोमस आयुर्वेदिक कॉलेज, भोपाल में अध्ययनरत हैं)

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