आरती बहू

हम सभी को महिलाओं व बालिकाओं के प्रति प्रेम और आदर का नजरिया रखने की जरूरत है, ताकि वो खुलकर आगे बढ़ पाएं। अपनी बात रख पाएं।

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@ शैलेश त्रिपाठी ‘शैल’

सुबह से घर में आज शांति छाई हुई थी। रामविलास की पत्नी का प्रसव हो रहा था। दाई बुला ली गई थी। अंदर नए मेहमान को लाने की जुगत लगाई जा रही थी।
अचानक से चीख की आवाज सुनाई देने लगी और कुछ ही पलों में माहौल एकदम शांत हो गया।

बिलासवा को बिटिया हुई है। जाओ बेटी के जन्म पर उत्सव मनाओ, कहते हुए दाई हाथ धोने लगी।

रामविलास पढ़े-लिखे इंसान थे। बेटा-बेटी में कोई फर्क नहीं करते थे। उनकी नजरों में दोनों ही एक समान थे।
दिन दुखों कि भांति बीतने लगे। बिटिया का नाम आरती रखा गया था। गांव के ही प्राथमिक विद्यालय में उसका प्रवेश करवा दिया गया। पढ़ने में होनहार थी। नाक नक्श भी ऊपर वाले ने अच्छा ही बनाया था। घर गृहस्थी के सारे कार्यों में निपुण थी।

धीरे-धीरे आरती उम्र की दहलीज पार करने लगी। मां-बाप को अब पराए खजाने की भांति बेटी की फिक्र होने लगी। मां का हृदय बेटी की ब्याह की बातें सुनकर जोर-जोर से धड़कना शुरू हो जाता था।

समाज में चोरी, शराब, जुआ आदि बुराइयां फैली थीं। मां-बाप ऐसा वर नहीं चाहते थे, जो इनमें लिप्त हो। अतः बेटी के लिए एक सुसंस्कृत और सभ्य परिवार उनकी पहली प्राथमिकता थी।

गजाधर बाबू मदनी गांव के नंबरदार थे। एक ही बेटा था। उनका लड़का अदालत में बैरिस्टर था। आरती के लिए इस वर का चुनाव किया गया। लेनी-देनी की बात तय हो गई।
ब्याह की तारीख ज्यों-ज्यों नजदीक आ रही थी। वैसे-वैसे आरती की मां को नीद आनी कम होती जा रही थी। रातभर बस बेटी के बारे में सोचती रहती।

क्या भविष्य होगा इसका?
दूसरे घर में कैसे रहेगी?
दुख तकलीफ किससे कहेगी?

आदि सवाल उनके जेहन में छाए रहते थे। ब्याह का दिन भी आ ही गया। सब कुछ ठीक-ठाक हो गया। बिटिया की विदाई कर दी गई।

कुछ दिन बीत जाते हैं।।
अब आरती के ससुराल में बुआ, फूफा, दूर की ननद, नंदोई आदि लोगों का आना-जाना पहले से ज्यादा बढ़ गया।
अक्सर शादी के बाद लड़की की फिक्र इन तमाम लोगों को ज्यादा ही हो जाती है।

घर में अब गुप्त दरबार चलने लगे। बहू को दबा के रखना। कोठरियों की चाभी अपने पास ही रखो। सुना है की बहुत पढ़ी-लिखी है। ज्यादा पढ़े-लिखे लोग ठीक नहीं होते।

आदि बातें प्रायः कहीं न कहीं से उसके कानों में पड़ती ही रहती थीं।

एक दिन उसने अम्मा यानी अपनी सास को अकेले में बुलाया।

और कहा —“अम्मा आप क्यूं इन लोगों को शह देती हैं। इनके दर दरबार सही नहीं हैं।”

अम्मा को तो जैसे लग ही गया कि पड़ोसी और नात सही ही कहते थे। ये अब हमसे करार करवाएगी।
गले में मिर्ची फंस जाने के समान उसका चेहरा तमतमाया जा रहा था।

आरती कोमल हदय की लड़की थी। कोई जोर की आवाज में बोल दे उसके अश्रु निकाल जाते थे।
वो तो बस अम्मा को समझाने आई थी कि ये लोग घर को नदी के जल से काटे जा रहे कगार के समान खंड करके गिरा देंगे।

पर यहां उल्टा हो गया। आरती को ही भला बुरा सुनना पड़ा।

घर का माहौल गरम हो चला था। आरती ने सारी बात अपने पति को बताई लेकिन, मातृभक्त होने के नाते वो मां की गलती सुनने को राजी नहीं हुए।

गलत का अंत गलत होता है। यही सच है। एक दिन अम्मा बीमार हो जाती हैं। अब उसकी सेवा का जिम्मा पूरा आरती पर आ जाता है। आरती सारे बैर भाव भुलाकर तन-मन से सास की सेवा करती है।

अम्मा को पछतावा होने लगता है। …मर के जी उठी फिर भी कोई देखने नहीं आया। बस बहू ही आगे-पीछे अम्मा-अम्मा करती रहती।

और उसी बहू को ना जाने क्या क्या कहा। उनकी आंखों से प्रेम के आंसू निकलने लगते हैं। वो बहू को वापस अपने पास बुलाती हैं ।और उसकी पीठ पर हांथ फेरते हुए उसको सदा खुश रहने का आशीर्वाद देने लगती हैं।

हर सास को बहू और हर बहू को सास के लिए सोचना आवश्यक है। भारत देश आज अंदरूनी कलहों का शिकार है। इस पावन भूमि पर आज अगर कुछ बचा है तो घरेलू झगड़े, महिला हिंसा, कन्या भ्रूण हत्या, दहेज जैसी बुराइयां आदि।

हम सभी को महिलाओं और बालिकाओं के प्रति प्रेम और आदर का नजरिया रखने की जरूरत है, ताकि वो खुलकर आगे बढ़ पाएं। अपनी बात रख पाएं।

(लेखक पंडित खुशीलाल शर्मा गवर्नमेंट ऑटोनोमस आयुर्वेदिक कॉलेज, भोपाल में अध्ययनरत हैं)

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