बुढ़ापा

मां-बाप का महत्व केवल “मदर्स डे” और “फादर्स डे” पर ही होता है। आज कितने मां-बाप ऐसे हैं, जो इन्हीं दो दिनों में शायद हंसते होंगे। जो अपना जीवन संतान पर अर्पण कर देते हैं। संतान उनके सामने रामदयाल जैसे हालात पैदा कर देती है।

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@ शैलेश त्रिपाठी ‘शैल’

रामदयाल रेलवे में मुंशी थे। 40 बरस सरकारी सेवा करने के बाद रामदयाल को सेवानिवृत्त किए जाने का कागज आया। सुबह की डाक से कागज उनके दफ्तर आ गया। मिलने वालों का तो जैसे तांता लग गया। बस हर कोई तारीफ किए जा रहा था, विभागीय बैर को भुलाकर।

शंकर रामदयाल के समकक्ष ही थे। पता चलते ही वो भी आए। वो रामदयाल के प्रगाढ़ मित्र थे। दोनों ने गले मिलकर अश्रु वर्षा करके इस रिश्ते को भावभीनी श्रद्धांजलि दे दी।

मेल-मिलाप का दौर किसी सिनेमा की फिल्म की भांति शीघ्र ही समाप्त हो गया।

शंकर बोले -“रामदयाल तुमको हमेशा परिवार के साथ रहने की इच्छा रहती थी। लो अाज परमात्मा ने पूरी कर दी। तुम चलो, पीछे-पीछे हम भी आते हैं।”

रामदयाल झेंप जाते हैं।
दोनों मित्रों ने पड़ोस की छोटी सी चाय की दुकान पर आखिरी चाय पी और बसंत ऋतु के समान जाने की तैयारी करने लगे।

शंकर तांगे से अपने दफ्तर की ओर निकल गए। रामदयाल अपने छोटे से रेलवे क्वार्टर आकर अपना सामान गठियाने लगे।
लाला के लिए ये लेना है। गुड़िया के लिए वो लेना है। धर्मपत्नी को साड़ी, नाती नतुरों को खिलौने आदि। समान की लिस्ट उनके दिमाग में बादलों के समान छाई हुई थी।

शाम को बाजार जाकर गृहस्थी का समान ले आए। रात तो उनकी बस इसी सोच में कट गई कि सुबह कब होगी।
अंततः सुबह किसी महिला के प्रसव के समान हो ही गई।

सामान उठा के माली से मेल मिलाप करके वो सुबह वाली गाड़ी से घर चलने को निकल पड़े।

आखिरी बार उस कमरे को पीछे मुड़कर देखा। मानो जैसे वो भी उनका कोई पुराना मित्र रहा हो।फिर ऐसे मुंह फेर के निकल गए, जैसे उससे कोई रिश्ता ही ना रहा हो।

तार भेज दिया था। लाला बस अड्डे पे समान लेने के लिए आ चुके थे। वो रामदयाल के बड़े लड़के थे, जिनके एक छोटा बच्चा भी था। बेटे ने बाप के पैर छुए और बैलगाड़ी में समान रखकर उनको बिठाया और घर की ओर चल दिया। रास्ता खेती-बाड़ी की बातें करते-करते कट गया। घर पर पहुंचते ही ऐसे प्रफुल्लित हुए मानो कैद से छूटकर आए हों।

आंगन पे पड़ी खटिया पे बैठ गए। सामान अर्धांगिनी को थमाया और नाद से पानी बोरकर कुल्ला करने लगे।

बहू नाश्ता लेके आई। चौरा पे रखा और ससुर के पैर छुए। “कल्याण हो”!
कह के वो नाश्ते की प्लेट उठा के खाने में लग गए। घर पर दुपहरी की तैयारी हो रही थी। रामदयाल का मनपसंद खाने को बनाया जा रहा था।
जैसा उन्होंने घर को लेके मन में कल्पना की थी। अभी तक तो वैसा ही हो रहा था।

दिन फाइटर जेट के समान उड़ने लगे और अब वो दिन भी आने वाले थे, जिनका अंदाजा रामदयाल को ना था।
अच्छे दिन तेज बहाव की नदी की रेत के समान तेजी से बह गए।

अब उनका घर में सुनने वाला कोई नहीं था। उनकी पत्नी प्रायः काम में लगी रहती थी। बेटा लाला को पत्नी और ससुराल वालों से फुरसत न थी। बेटी जो कि ब्याह की उम्र की हो गई थी, उसका पड़ोसियों के यहां बैठक बना रहता।

रामदयाल इन सब बातों को ध्यान से देखा करते थे। वो इसकी शिकायत पत्नी से करते। लेकिन, अब उनके धैर्य का घड़ा किसी गुब्बारे के समान फूट गया। उन्होंने बेटी को एक दिन डांट लगा दी। बेटे से भी कहासुनी हो गई। …तो बहू ने भी मुंह डार लिया।

सही ही तो था, रामदयाल सुसंस्कृत और सभ्य व्यक्ति थे। नौकरी के दौरान काफी सम्मानित घरानों में उठना-बैठना था। वे ये सब खुद के घर में कैसे बर्दाश्त करते।

रामदयाल को उनके किए का उपहार भी किसी खरपतवार के समान शीघ्र ही मिल गया।

“दद्दा का व्यवहार अब बस के बाहर होता जा रहा है”

“ऐसा होता रहना हो तो मुझे अलग कर दो” लाला बोला।

“हां भैया “पता नहीं दद्दा को क्या हो गया है। हमेशा मुझ पे खिसियाए रहते हैं। अम्मा तुमको बुरा लगे या अच्छा, हम दद्दा के साथ नहीं रहेंगे।” -बेटी बोली

रामदयाल स्तब्ध रह गए। अच्छा समझाने की उनको बुरी कीमत मिल चुकी थी।
घर को लेके उनके मन के सारे ख्वाब राई के दाने के समान बिखर गए।

बाहर वाली कोठरी पर उनकी खटिया रख दी गई। बगल में पानी पीने को घड़ा रख दिया गया। अगर कोई आवाज लगा दे तो खाना खाने आए जाने की छूट थी। जितनी पूंजी घर और उसके संस्कारों को बनाने में उन्होंने लगाई थी, उसका मूलधन भी ना सूद कर सके।

यदा कदा उनकी पत्नी उनको पास आ जाती थी। समझाती और फिर वापस चली जाती । रामदयाल टूट चुके थे। उनको फिर अपना कार्यालय याद आने लगा। शंकर याद आने लगे।

वो अब बीमार से होने लगे थे। दिन-दिनभर कुछ न खाते थे। बस पड़े-पड़े आत्मग्लानि का जहर पीते रहते।

इसी कुंठा को लिए रामदयाल तीन बरस में ही स्वर्ग सिधार गए। घर आज भी वैसा ही है। बेटी की शादी हो चुकी है।

लेकिन, अब उनकी पत्नी ने बहू-बेटे के साथ मिल के आत्म सम्मान विहीन जीवन जीना सीख लिया है।

मां-बाप का महत्व केवल “मदर्स डे” और “फादर्स डे” पर ही होता है। आज कितने मां-बाप ऐसे हैं, जो इन्हीं दो दिनों में शायद हंसते होंगे। जो अपना जीवन संतान पर अर्पण कर देते हैं। संतान उनके सामने रामदयाल जैसे हालात पैदा कर देती है।

वो केवल बच्चों के भले के लिए ही डांट लगाते हैं। लेकिन, पता नहीं क्यूं वो डांट बच्चों को सबसे अपमानजनक लगती है।

(लेखक पंडित खुशीलाल शर्मा गवर्नमेंट ऑटोनोमस आयुर्वेदिक कॉलेज, भोपाल में अध्ययनरत हैं)

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