पवित्र सावन माह : सोमवार से शुरू और सोमवार को ही समापन

आचार्य सुधानंद झा बता रहे हैं कि क्यों है सावन माह और उसमें पड़ने वाले सोमवार का इतना महत्व, क्या है इसके पीछे का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक कारण

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डिजिटल डेस्क

भगवान शिव का अति प्रिय माह सावन इस बार 6 जुलाई से शुरू होकर 3 अगस्त को रक्षाबंधन के दिन संपन्न होगा।

6 जुलाई को सावन के शुभारंभ के दिन सोमवार पड़ रहा है और 3 अगस्त को समापन भी सोमवार को हो रहा है। इस बार सावन माह में पांच सोमवार पड़ रहे हैं। इसलिए इस बार के सावन मास का विशेष महत्व है।

विशेष संयोग लेकर आ रहा सावन का पहला सोमवार

आचार्य डॉ सुधानंद झा के अनुसार इस बार सावन माह का शुभारंभ सोमवार से हो रहा है। पहला सोमवार यानी इस माह का शुभारंभ बहुत अच्छे संयोग में हो रहा है। इस दिन शनि और चंद्रमा एक साथ रहेंगे और मकर राशि में रहेंगे। इस योग में भोलेनाथ की पूजा करने से भक्तों को सभी संकटों से मुक्ति मिलेगी। अपने जीवन की समस्याओं को दूर करने के लिए भगवान भोलेनाथ की पूजा करें।

भगवान को प्रसन्न करने का अवसर

महान ज्योतिषी आचार्य सुधानंद झा बताते हैं कि सावन माह का इंतजार मनुष्यों के साथ देवों और दानवों को भी रहता है। सभी चाहते हैं कि इस माह में अपने आराध्य भगवान भोलेनाथ की पूजा कर उन्हें प्रसन्न करें और अपना जीवन धन्य कर लें। ऐसा इसलिए कि इस माह में सारे लोकों की शक्तियां भगवान भोलेनाथ में समाहित हो जाती हैं और वे मात्र जल चढ़ाने से ही प्रसन्न होकर भक्तों की सारी मनोकामनाएं पूरी करते हैं।

सावन में सोमवार का इतना क्यों है महत्व

आचार्य के अनुसार सृष्टि की शुरुआत के बाद सभ्यताएं फलने-फूलने लगीं। लेकिन, द्रव्य यानी समृद्धि नहीं थी। इस पर समुद्र मंथन का निर्णय देवताओं और दानवों ने लिया। सारे रत्न समुद्र में थे। समुद्र मंथन में 14 प्रकार के रत्न निकले। समुद्र मंथन में रस्सी के रूप में भगवान विष्णु के स्वरूप शेषनाग जिनका नाम अजीत है, को प्रयोग में लाया गया। मंथन संपन्न होने के बाद शेषनाग जब थकावट के कारण लंबी-लंबी सांसें लेने लगे तो उनकी सांसों से ज्वाला के रूप में भीषण विष निकलने लगा। इससे पृथ्वी पर प्रलय की आशंका उत्पन्न हो गई। किसी में इस विष के शमन का सामर्थ्य नहीं था। इस पर भगवान भोलेनाथ ने सृष्टि की सुरक्षा के लिए स्वयं इस विष को धारण करने का निर्णय लिया। भोलेनाथ ने अपनी योग शक्ति से शेषनाग के विष को एक पात्र में एकत्र किया और उसे पीने लगे। इस पर वहां मौजूद देव-दानवों में हाहाकार मच गया। सभी को पता था कि अगर ये विष भोलेनाथ के कंठ से नीचे उतर तो पूरी सृष्टि तबाह हो जाएगी क्योंकि भोलेनाथ के हृदय में ही पूरी सृष्टि विद्यमान है। सभी देवों और दानवों ने भोलेनाथ के चरण पकड़ लिए। सभी ने आग्रह किया कि इस विष को वे गले से नीचे न उतरने दें। महाप्रलय हो जाए। इस पर महादेव ने विष को कंठ से नीचे नहीं उतरने दिया। इस विष के प्रभाव से भगवान का कंठ नीला पड़ गया। इसलिए भगवान भोलेनाथ का नाम नीलकंठ पड़ा।

भगवान का बाल रूप

लेकिन, इस विष के असर से भगवान विचलित होने लगे। कंठ में ही विष धारण करने के कारण उसे सहन करना मुश्किल होने लगा। इस पर उनकी शांति के लिए भगवान ब्रह्मा अपने कमंडल के जल से भोलेनाथ के माथे पर अभिषेक करने लगे। भगवान विष्णु अपने चरण से निकलने वाली पतित पावनी मां गंगा से भोलेनाथ का जलाभिषेक करने लगे। इससे भोलेनाथ को शांति मिलने लगी। यह देख वहां मौजूद सभी देव, दानव, पशु-पक्षी अपने सामर्थ्य के अनुसार जल भर-भरकर उनका जलाभिषेक करने लगे। इससे भोलेनाथ को शीतलता आने लगी लेकिन उनको नींद नहीं आ रही थी। अंदर की ज्वाला नहीं शांत हो रही थी। उनकी आंखें बंद होने लगीं और तीसरा नेत्र खुलने लगा। भगवान का तीसरा नेत्र खुलने पर फिर सृष्टि के संहार का संकट उत्पन्न होने लगा। इस पर मां जगदंबा ने माता तारा का रूप धारण किया और भोलेनाथ से बाल स्वरूप में आने के लिए अनुरोध किया। शिव जी बाल रूप में आए और मां तारा उनको गोद में लेकर दूध पिलाने लगीं। मां के दूध में ही ऐसी शक्ति है कि बच्चा कितनी भी परेशानी में हो वह सो जाता है। इसलिये हम लोग कहीं-कहीं भगवान शिव को बाल रूप में निद्रा में दिखते हैं। इस पर भोलेनाथ को नींद आई। वहीं से तारा मां की पूजा भी सावन के सोमवार को प्रारंभ हो गया। इस अवसर पर भगवान शिव ने आशीर्वाद दिया कि जो भी माता तारा और मेरे बाल रूप की पूजा करेंगे, उनकी संतान की कामना पूरी होगी। उनके जीवन से संकट दूर होगा। वे निःसंतान नहीं रहेंगे।

इसलिये चढ़ाई जाती है कांवड़

भगवान भोलेनाथ में विष का असर कम करने के लिए देवताओं की देखादेखी मनुष्य और अन्य जीव भी कंधे पर बड़े-बड़े पात्रों में जल भरकर दूर-दूर से लाकर भगवान शिव के माथे पर अभिषेक करने लगे। चूंकि, ये घटना सावन के पहले सोमवार को हुई, इसलिए सावन में आज भी दूर-दूर से कावंड़ में जल लेकर भगवान भोलेनाथ का अभिषेक किया जाता है।

इसलिए चढ़ता है महादेव को भांग-धतूरा

आप सोचते होंगे कि सावन माह में भगवान भोलेनाथ को भांग, धतूरा, चिलम, गांजा आदि क्यों चढ़ाया जाता है? सारे नशा वाले पदार्थ क्यों चढ़ाए जाते हैं। तो हम बता दें कि इस घटना के समय महादेव ये संदेश दिए थे कि मेरे ऊपर नशे के पदार्थ चढ़ाने वाले मनुष्यों के जीवन में विष की शांति होगी। साथ ही भक्त संकल्प करें कि वह इस दिन से नशे का सेवन नहीं करेंगे। जो लोग इसे शिव जी की बूटी मानते हैं वे उनका अपमान कर रहे होते हैं। यही सावन का महत्व है। मंथन के दिन सावन का पहला सोमवार था। इस दिन भगवान शिव वरदान दिए थे कि जो भी भक्त सावन के दिन नशा छोड़ने का संकल्प लेगा, माता के रूप में तारा और मेरे बाल रूप की सावन में पूजा करेगा उसकी सारी मनोकामनाएं पूरी होंगी। जो भी मनुष्य कांवड़ में जल लेकर मेरा अभिषेक करेगा, उसकी सारी मनोकामनाएं पूरी होंगी।

एक वजह ये भी

एक बार चंद्रमा को क्षय रोग हो गया। काफी उपाय के बावजूद जब सही नहीं हुआ तो उन्होंने सोमनाथ में भगवान शिव की कठोर तपस्या की। इससे प्रसन्न होकर भोलेनाथ ने उनका कष्ट दूर किया और चंद्रमा को सिर पर धारण किया। भोलेनाथ ने चंद्रमा को जिस दिन सिर पर धारण किया, उस दिन सावन का सोमवार था।

ऐसे करें व्रत

सोमवार को आप अपनी सुविधा के अनुसार कई तरह से पूजा कर सकते हैं। पहला, आप दिनभर व्रत कीजिये। फलाहार कीजिये और रात में भोजन ग्रहण करिए। कुछ लोग 24 घंटे का व्रत करते हैं। फलाहार करते हैं। कुछ लोग सेंधा नमक का भी सेवन करते हैं। जिनको मधुमेह है वो सांवां का चावल खाकर व्रत करते हैं। गर्भवती फलाहार कर सकती हैं।

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