सुदर्शन चक्र वाले कृष्ण

शत्रु हमारे सामने हमारी मातृ भूमि को पैरों तले रौंदना चाहता है और हम गैर जागरूक, कहने मात्र के शिक्षित, केवल दिखावे के लिए देशभक्ति का अंधा मंचन कर रहे हैं।

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@ शैलेश त्रिपाठी ‘शैल’

पूरे देश में राष्ट्रीयता उबाल पर थी। बच्चा-बच्चा देश के लिए समर्पित होने को बेचैन था। बात उन दिनों की है, जब गलवान घाटी में निहत्थे भारतीय सैनिकों पर चीनी सैनिकों ने बर्बर तरीके से लोहे की रॉड, कील लगी लकड़ी, फेंस लगे बेंत से हमला किया था।

इस घटना से देश जैसे हिल सा गया था। सड़क से संसद तक हर जगह गहमा-गहमी थी। न्यूज चैनलों पर तो डिबेट की बाढ़ सी आ गई थी। स्कूल हों, कॉलेज हों, बालक हों, बालिका हों, सभी बस यही कह रहे थे कि चीन को सबक सिखाओ। सबक सिखाओ!

क्या सबक सिखाओ, ये आधों को पता नहीं था। कैसा सबक सिखाओ, ये 25 प्रतिशत को ही पता था। किस मोर्चे पर सबक सिखाओ, ये दस प्रतिशत को पता था।

तो ये तो रही राष्ट्रीयता की स्थिति।
वाट्सएप यूनिवर्सिटी पर लेख आने लगे-“बॉयकॉट चाइना”
पर जिस वीडियो में से वो ये संदेश देना चाहते थे, वो खुद चाइनीज एप्लिकेशन द्वारा बने थे।
ये रहा युवाओं का स्किल टेस्ट।

कुछ लोगों ने इसे सुनहरे अवसर के तौर पर देखा और वो इस अवसर को गंवाना नहीं चाहते थे। अतः उन्होंने पूरी श्रद्धा, ईमानदारी से तत्कालीन प्रधानमंत्री ‘मोदी जी’ को भला-बुरा कहना शुरू कर दिया। यहां मोदी जी लिखने का ये बिल्कुल मतलब नहीं है कि मैं संघी हूं या आरएसएस वाला। हां, मैं भारतीय हूं और संविधान प्रदत्त अधिकारों के तहत ये लिखने का अधिकारी भी हूं।

अब बात काम की आती है। भारत धीरे-धीरे अपनी डिप्लोमेसी के तहत चीन को कई फ्रंट पर घेरना शुरू करता है। वो आर्थिक, राजनीतिक, रणनीतिक, राजनयिक आदि थे।
अब तक चीन को ये बखूबी समझ आ चुका था कि भारत का अधिग्रहण इस समय में तो नामुमकिन है।

क्यूं ना अपने आपको सर्वश्रेष्ठ समझने वाले पश्चिमी सभ्यता का नकाब पहने भारतीय युवाओं को बरगला लिया जाए। उनको कुछ-कुछ दिखाकर बहुत कुछ उनका देख लिया जाए।

बिल्कुल सही पकड़ा, आपने मैं टिक टॉक की बात कर रहा हूं। इस ऐप के बैन होते समय शायद इतनी गाली युवक और युवतियों ने किसी को नहीं दी होगी, जितनी मोदी जी को दी गई।

गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में अगर शामिल कर लें तो मोदी जी विश्व के सबसे बड़े गाली खाने वाले राजनेता होंगे।

अब आप समझिए। एक तरफ युवा सरकार से कुछ करने की आस लगाए हैं। दूसरी तरफ, सरकार का विरोध भी करते हैं। तथाकथित लोग, जो यूपीएससी की तैयारी करते थे, उन्होंने तो इसको मूल अधिकारों से जोड़ के रख दिया। हो सकता है, उस समय तक उन्होंने “राष्ट्रीय सुरक्षा” का पाठ ना पढ़ा हो। पढ़ेंगे भी कैसे। समय तो टिक टॉक में जाता था।

गालवान घाटी की घटना को कई दिन बीत जाते हैं। विपक्ष तो मधुमक्खी के समान हमलावर हुआ जा रहा था। एक समय के लिए लगा कि अगर विपक्ष को आर्मी में भेज दें तो ये चीन सीमा विवाद का संकट ही खत्म हो जाएगा।

अब समय आता है भारत का। प्रधानमंत्री का आकस्मिक लेह-लद्दाख का दौरा होता है। चाइना को भनक मिलते ही कान खड़े करके उनके विदेश मंत्रालय में स्थिति को समझने की ऊहापोह शुरू हो जाती है।

“हम बांसुरी बजाने वाले कृष्ण को भी पूजते हैं और सुदर्शन चक्र वाले कृष्ण को भी” मैं मानता हूं। इस लाइन का बहुत बड़ा संदेश विदेशी मीडिया को गया। उनको देर नहीं लगी होगी, ये समझने में कि भारत अब चुप बैठने वालों में से नहीं है।

चीनी सूत्रों के बयान आते हैं कि हम बातचीत और सीमा विवाद में शांति की पहल को अपनाते हैं।
सही भी है। वैश्विक पटल पर मुंह के बल गिरने से अच्छा है । अप्रत्यक्ष “सॉरी” बोल दो। फिलहाल, लेख लिखे जाने तक चीनियों की स्थिति तालाब से निकाल ली गई मछली के समान थी।

इन समस्याओं से हम आज नहीं तो कल पार पा जाएंगे। लेकिन उन विचारों से कैसे पार पाएंगे, जो हमारे अंदर की संस्कृति, सभ्यता, सम्मान, एकता, अखंडता, बलिदान को रह-रह के चोटिल करते हैं।

शत्रु हमारे सामने हमारी मातृ भूमि को पैरों तले रौंदना चाहता है और हम गैरजागरूक, कहने मात्र के शिक्षित, केवल दिखावे के लिए देशभक्ति का अंधा मंचन कर रहे हैं।

“वक्त है चीत्कार का, विश्वास का अधिकार का
लाचारी नहीं, गद्दारी नहीं, इंतजार बस ललकार का”

photo credit : pib india and social media

(लेखक पंडित खुशीलाल शर्मा गवर्नमेंट ऑटोनोमस आयुर्वेदिक कॉलेज, भोपाल में अध्ययनरत हैं)

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