गोलू दादा

समाज में आज भी ऐसे समर्पित गोलू दादा की कमी है। साधन होने के बावजूद लोग किसी की मदद से मुकर जाते हैं। स्वार्थपरता का पर्दा सभी को ढके हुए है। भारत तब तक आत्मनिर्भर नहीं बनेगा, जब तक समाज में गोलू दादा जैसे लोग फिर से नहीं आ जाते।

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@ पंडित शैलेश त्रिपाठी ‘शैल’

ठाकुर रुद्र प्रताप सिंह जादौन उर्फ “गोलू दादा” रायसेन रियासत के नंबरदार के छोटे बेटे थे। कद काठी एक चढ़ी जवानी के युवक के समान थी। लिलार हिमालय के समान ऊंचा, आजाद के समान चढ़ी मूछें, भरा चेहरा और दूध के समान तेज वाले प्रतिभावान एवं देशभक्त इंसान थे।

गोलू दादा को गांव के युवक अपना भविष्य मानते थे। लगान के कागज दिखाने से लेकर, अदालत के वारंट तक सारे कागजी रहस्यों को वो भलीभांति समझते थे।

आज दादा के घर में चहल-पहल थी। गाय ने बछड़ा दिया था। घर में उत्सव मनाया ज रहा था।

गोलू दादा की माता जी बड़े ही सात्विक प्रवृत्ति की थीं। दान, धरम, पूजा, पाठ आदि उनमें कुछ असाधारण गुण थे। दादा को गाय दुहने के लिए बैठाया गया। गाय बछड़े से ज्यादा वात्सल्य दादा पर रखती थी। दादा को अपने पास आते देखकर उसने जोर से रमहाया।।

हाथ में पतीला लिए दादा ने गौ का गेराव पकड़ा। उसको सूखे में बांधा और दुहने लगे। दूध मां को दिया।

पनही पहनकर वो गांव की ओर निकल गए। तालाब के पार में सभा लगी हुई थी। दादा के घर की उत्सव वाली बात आसपास के गांव में किसी चुनावी सभा के व्याख्यान के समान फैली हुई थी।

“दादा आ गए ” कहकर एक युवक उनको सभा के मध्य ले आया।

गोलू दादा ने राम-राम किए, वहीं बैठ गए और बोले

“क्या बात है दल्लू, सब परेशान क्यों हैं?

अरे कोई तो बताओ?…

दादा चिल्लाए।

एक झूर मुंह का बुजुर्ग बोला

“दादा, नदी वाले खेत में नीलगाय का झुंड फसल बर्बाद कर रहा है। वहां जाने पर पड़ोस के गांव वाले वापस इस पार उनको हांक देते हैं। फसल अच्छी है। लगान तय हो चुका है।
इस बार महाजन नहीं छोड़ेगा।”

दादा ने ध्यान से सारी बातें सुनीं। रात का समय समस्या के हल के लिए किसी जोड़े के विवाह के समान निश्चित कर दिया गया।

झींगुर की आवाज चारों ओर छाई हुई थी। अंधियारी रात थी। कुछ लोगों ने लालटेन ले रखी थी । दादा के हाथ में दो पुरुष का डंडा और एक रस्सी थी।

झर्र-झर्र की आवाज आई। झुंड आ चुका था। दादा ने फुसफुसाया

“लालटेन जलाओ और नीम की डाली में टांग दो।”

झुंड को अहसास हो गया था कि आज दुखभरी रात के समान कुछ लोग बढ़े ही आ रहे हैं। लेकिन वो इन सबसे दो-चार होना जानते थे।

बस, उनको दुर्योधन के समान इस बात की पुष्टि नहीं थी कि अर्जुन रूपी किसानों के जुलूस रूपी रथ को हांकने वाले श्रीकृष्ण गोलू दादा थे।

दादा ने भमा के डंडा मारा। डंडा
भाय-भाय करता हुआ झुंड के सरदार पर पड़ा। वह उल्टे पांव भागा और नदी में हिल गया।
दादा भी नदी में कूद पड़े। दादा के काल की भांति पीछे पड़े होने के कारण झुंड राणा से प्राण बचाते मुगलों की सेना के समान भाग रहा था।

कई मील तक चागेड़ने के बाद दादा और किसान लौट आए । फसल बच गई ।

दो-तीन महीने बीत जाते हैं। दादा रियासत में ही जनजागृति के नेतृत्व में लग जाते हैं। वो गरमदल के प्रचंड समर्थक थे। नसों में रक्त हो ना हो, राष्ट्रीयता जरूर थी। उसका प्रमाण उनके कॉलेज वाले दिनों से मिल जाता है।

कक्षा में कई वर्ग विशेष के छात्र रहते थे। दादा ने कभी जाति को ऊपर नहीं होने दिया। कभी-कभी आपसी संघर्ष में उन्होंने इस तरह मध्यस्थ की भूमिका निभाई, जैसे गांधी जी निभाते थे।

आधी रात हो चुकी थी। माघ-पूस का समय था। गांव में एक बुजुर्ग बीमार पड़ गए थे। घर में बीमारी और लाचारी दो ही विराट संपत्तियां थीं। जिनको लूटने वाला कोई भी नहीं था। मिट्टी की दीवार पर अरिया में डब्बी जल रही थी । कोने में बैठी बुढ़िया टुकुर-टुकुर निहार रही थी। उसको बुजुर्ग के अंतकाल का भान मानसून के समान हो गया था।

उम्मीद की आखिरी किरण गोलू दादा थे, पर इस पहर उनके पास जाए कोन?
क्या सोचेंगे?

ये लोग सोने भी नहीं देते।

आदि तरह-तरह के प्रश्न से वो विचलित हो रही थी।

अंततः उसने जाने की ठानी।

लाठी उठाई। कमर पहले से झुकी थी। अतः द्वार से निकलने में उसे कुछ खास दिक्कत नहीं हुई।

सड़क पर आते ही कुत्तों का भोंकना शुरू हो गया। पर जब पति के प्राण अटके हों तो भला उस समय कोन सी नारी अपने प्राणों की अपेक्षा करती है। वह दादा के घर की ओर लपकी हुई चली जा रही थी।

द्वार पर जा के लाठी पटक दिया। पूरी ताकत से चिल्लाई

“गोलुवा दादा”

दादा बरामदे में सोते थे। अचानक से उठ गए। हाथ में लट्ठ उठाया और पूछा-“कोन”

“में रमकली”

“अरे काकी, इतनी रात”

दद्दा बहुत बीमार है, लाला”

“चलो ” दादा ने बैलगाड़ी नाधी। काकी को बिठाया और खुद हांकते हुए उसके घर पहुंचे। उसी गाड़ी से फौरन उसको बेलापुर के वैद जी के यहां ले गया। समय से पहुंचने के कारण दद्दा के प्राण बच गए थे।

सारे गांव में गोलू दादा की जयकार थी। महिलाएं दुहाई दे रही थीं। लड़कियां कलश लिए लोकगीत गा रही थीं। उनका स्वागत किसी देव मानुष सरीखे किया जा रहा था।

समाज में आज भी ऐसे समर्पित गोलू दादा की कमी है। साधन होने के बावजूद लोग किसी की मदद से मुकर जाते हैं। स्वार्थपरता का पर्दा सभी को ढके हुए है। भारत तब तक आत्मनिर्भर नहीं बनेगा, जब तक समाज में गोलू दादा जैसे लोग फिर से नहीं आ जाते।

(लेखक पंडित खुशीलाल शर्मा गवर्नमेंट ऑटोनोमस आयुर्वेदिक कॉलेज, भोपाल में अध्ययनरत हैं)

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