गुरु पूर्णिमा पर इस बार बन रहे चार सुंदर योग

5 जुलाई को है गुरु पूर्णिमा, इस अवसर पर गजकेशरी, विद्या योग, अमर अनंत योग और बुधादित्य योग का बन रहा संयोग

senani.in

डिजिटल डेस्क

गुरु पूर्णिमा 5 जुलाई को मनाई जाएगी। इस बार इस पर्व का खासा महत्व है क्योंकि यह एक साथ चार योग गजकेशरी योग, विद्या योग, अमर अनंत योग और बुधादित्य योग लेकर आ रहा है।

महान ज्योतिषी आचार्य डॉ सुधानंद झा के अनुसार गजकेशरी योग में जो भी पर्व हम मनाते हैं, वह बहुत फलदायी होते हैं। गजकेशरी योग का मतलब है चंद्रमा और बृहस्पति का एक साथ होना। इसके अलावा चंद्रमा और बृहस्पति के ठीक सामने इस दिन सूर्य और बुध भी रहेंगे। इसलिए इस अवसर पर बुधादित्य योग भी बन रहा है।

अन्य राशियों का भी सुंदर संयोग

इस अवसर पर शनि, बृहस्पति, शुक्र और बुध अपनी राशि और घर में रहेंगे। इसलिये गुरु पूर्णिमा का इस बार महत्व और बढ़ गया है।

इसलिए मनाई जाती है गुरु पूर्णिमा

आषाढ़ मास शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को गुरु पूर्णिमा मनाई जाती है। इसी दिन चारों वेदों के रचयिता एवं वेदों के संग्रहकर्ता, उनको लिपिबद्ध करने वाले महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ था। महर्षि वेदव्यास को विश्व का प्रथम गुरु भी कहा जाता है।

ऐसा इसलिए क्योंकि पहले ज्ञान एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्थानांतरित होता था। ज्ञान पुस्तक के रूप में नहीं था। लोग मौखिक रूप में याद करते थे। मस्तिष्क ही पुस्तक हुआ करता था। ज्ञान को लिपि के रूप में लिखकर पुस्तक का आकार देने का काम सबसे पहले महर्षि वेदव्यास ने किया। महर्षि ने सबसे पहला ग्रंथ ऋग्वेद लिखा। विज्ञान ने भी प्रमाणित किया है कि संसार का सबसे पहला ग्रंथ ऋग्वेद है और यह संस्कृत में है।

लुप्त होने लगा था ज्ञान

वेदव्यास के समय भाषा बहुत परिष्कृत हो चुकी थी। सभ्यता का विकास होने लगा था। लोगों की आवश्यकताएं बढ़ने लगीं। चूंकि, लोगों की स्मृति विभिन्न विषयों में बंटने लगी, इसलिए यह क्षीण होने लगी थी। इस कारण ज्ञान के समाप्त होने का संकट उत्पन्न होने लगा। ऐसे में महर्षि वेदव्यास ने सोचा कि यदि हम ज्ञान को लिपिबद्ध कर देते हैं और पत्र पर लिखकर संग्रहित कर लेते हैं तो ज्ञान सुरक्षित हो जाएगा।

महर्षि ने की चारों वेदों की रचना

ज्ञान को लिपि के रूप में ऋग्वेद में लिखकर संग्रहित करने का सबसे पहले काम महर्षि वेद व्यास ने किया। इसलिये वेदव्यास को गुरु की उपाधि से अलंकृत किया गया और उनकी जन्मतिथि आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाने लगा।

गुरु कौन?

आचार्य सुधानंद झा बताते हैं कि गुरु कोई भी हो सकता है। गुरु बालक, वृद्ध, पशु-पक्षी या कोई भी महिला या पुरुष हो सकता है। गुरु की कोई जाति नहीं होती। वह किसी भी जाति या धर्म का हो सकता है। जो अपने शिष्य की अज्ञानता पर भारी पड़ता है। उसे गुरु कहते हैं। जो अपने शिष्यों की अज्ञानता दूर करे, उसे गुरु कहते हैं।

अनपढ़ भी हो सकता है गुरु

गुरु का पढ़ा-लिखा होना ही जरूरी नहीं है। कोई अनपढ़ व्यक्ति या बालक भी अगर हमारी किसी समस्या का समाधान करे या हमारी गलती का एहसास कराए, वो हमारा गुरु हो सकता है।

ऐसे मनाएं गुरु पूर्णिमा

गुरु पूर्णिमा के दिन प्रातःकाल उठकर अपने माता-पिता, गुरु, वेदव्यास जी, भगवान गणेश का ध्यान करिए। स्नान के बाद नए वस्त्र धारण करें। इस दिन दीक्षा भी ले सकते हैं। अगर कोई गुरु नहीं मिल रहा हो इस दिन पास के किसी मंदिर जाएं और भगवान भोलेनाथ की पूजा करके उनको गुरु मान सकते हैं। महादेव संसार के गुरु हैं।

बड़े-बुजुर्गों का करें सम्मान

गुरु पूर्णिमा के दिन मंदिर में पूजा करने के बाद घर के बड़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद लें। उन्हें वचन दें कि हम अपने खानदान और कुल की परंपरा की रक्षा करेंगे। हम अपने अच्छे कर्मों से अपने परिवार, समाज और देश का मन-सम्मान बढ़ाएंगे। यही सच्ची गुरु पूर्णिमा होगी।

गुरु को वस्त्र और द्रव्य करें भेंट

इस दिन वस्त्र और द्रव्य अपने गुरु को देना चाहिए। साथ ही गांव-शहर के बच्चों को जागृत करने वालों का भी स्वागत और सम्मान करना चाहिए। ऐसे लोगों का भी सम्मान करना चाहिए, जो दूसरों का जीवन संवारने में लगे हैं।

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