आजीवन कर्जदार

देश में आज भी शोषण होता है। हां, अब रामचरण जैसे लोग नहीं हैं। पर, जो भी हैं, उनसे कम भी नहीं हैं। इस बीमारी को मिटाने के लिए सोच में व्यापक परिवर्तन की आवश्यकता है।

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@ पंडित शैलेश त्रिपाठी ‘शैल’

दोपहर चढ़ रही थी। टूटे पत्थरों की सड़क सुनसान थी। कभी-कभी एकाध सियार या आवारा कुत्ते सड़क पार करते दिख जाते थे।

झखुआ पगड़ी पहने और हाथ में एक पोटली दबाए लंबे-लंबे डग भरता भागा चला जा रहा था।
रास्ते का बरसाती नाला ज्यादा तो नहीं भरा था, लेकिन उसको आसानी से पार नहीं किया जा सकता था। झखुवा के लिए वो वैतरणी नदी से कम ना था। पर पार तो जाना ही था। नाले से कुछ ही दूरी पर रामचरण सेठ की हवेली थी। द्वार पर दो-चार लोग तेल लगे लट्ठ पकड़े बैठे थे। किसी ने जोर से ललकारा-कौन है!

कुछ देर के लिए झखुआ को लगा, जैसे यमराज ने पुकारा हो। सहम कर पगड़ी ठीक की और माघ-पूष की रात की ठंड के समान कांपते मुख से बोला

-मैं हूं मालिक, झखुआ

अच्छा आ, पैसे पूरे लाया है ना?

हैं मालिक …पर पूरे तो नहीं लाया।

रामचरण ने चिलम को लात मार दी और गुस्से में बोले-कल्लू इसके घर में जो भी मिले सब ले आओ

बेचारे किसान को ब्रिटिश अदालत के माफिक अपना पक्ष तक नहीं रखने दिया गया।

कुछ ही देर में वहां किसी गरीब की बेटी के दहेज के समान की तरह एक हंडिया, एक टूटा हल, गाभिन गाय और एक अपने अंत समय को झेलती हुई खाट लाकर रख दी गई।

ये सब अब नीलाम होना था। अंधेर भी कितना है, जिनकी कीमत ना हो वो भी चीजें बिक जाती हैं। बशर्ते, वो गरीब के घर की हों।

चीजें खेती हेतु लिए गए कर्ज से कम थीं। एक छोटी सी बंधिया थी। उस पर तो उधारी के समय से ही शनि देव की तरह रामचरण बैठे थे। अब फैसला हुआ।

झखुआ जमीन से बेदखल कर दिया गया। किसान को अपनी जमीन से भावनात्मक लगाव होता है। झखुआ को कहीं ज्यादा था।

और अब झखुआ सेठजी के यहां रात की बियारी भरे दिनभर काम किया करेगा, जब तक कर्जा वसूल नहीं हो जाता।

वसूल शब्द शायद गलती से लिख गया होगा। क्यूंकि सेठ का कर्जा तो जन्म-जन्मांतर तक के लिए था, जो कितना भी दो। वसूली चलती ही रहेगी।

रात्रि में आकाश में तारे चमक रहे थे। जुगनू अपनी रोशनी से मानो प्रथविमंडल को प्रकाशित करने के लिए बेचैन थे। झखूआ चुपचाप चला आ रहा था। आहट पाके कुत्ते अपनी स्वामिभक्ति दिखाने लगे। वह घर आया । दिद्दा को बिना बताए अंगौछा उठाया और खेत की ओर निकल गया। खेत के मांझे में बमुरा का पेड़ था। उसकी डाली से अंगौछा बांधा। एक बार पीछे मुड़कर उसने दुनिया को देखा। मानो कह रहा हो कि अब वहां जाएगा, जहां रामचरण जैसे सेठ नहीं रहते हों।

प्रातःकाल चीत्कार मच गया। झखुआ ने फांसी लगा ली थी। खेत के भरोसे जीवित तो नहीं रह पाया, लेकिन मर जरूर गया।

सेठ को अब नए आदमी की तलाश थी। और वो था झखुआ का लड़का छेदिया। बाप के लिए कर्ज की भरपाई छेदिया आज भी कर रहा है। अब वहीं से उसका घर चलता है। वो सेठ का पक्का मजदूर बन गया है।

बाप तो स्वाभिमान से जिया लेकिन बेटे ने अपमान से जीना सीख लिया।

देश में आज भी शोषण होता है। हां, अब रामचरण जैसे लोग नहीं हैं। पर, जो भी हैं, उनसे कम भी नहीं हैं। इस बीमारी को मिटाने के लिए सोच में व्यापक परिवर्तन की आवश्यकता है।

(लेखक पंडित खुशीलाल शर्मा गवर्नमेंट ऑटोनोमस आयुर्वेदिक कॉलेज, भोपाल में अध्ययनरत हैं)

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