चुन्नी नाई

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@ पंडित शैलेश त्रिपाठी ‘शैल’

समाज में आज भी लड़कियों के ब्याह में बिचौलिये रहते हैं, लेकिन चुन्नी नाई जैसे अब नहीं रहे।

चुन्नी नाई पहाड़ीखेड़ा से रमजुआ को निकल पड़ा था। रात्रि का अंतिम पहर बीतने वाला था। आसमान से तारे ना पढ़ने वाले बच्चों के समान गायब हो रहे थे । चुन्नी हड़बड़ी में था। उसे हरदयाल सिंह की बेटी का सुत्करा लेके जाना था। मार्ग में कुछ बैलगाड़ियां मिलीं। वो उनमें सवार होकर पछीत का जंगल उतर आया और पहरभर में हरदयाल की कोठी में पहुंच गया।

घर की मालकिन ने नाई को सत्तू खिलाया और सुत्करा देते हुए बोला-कक्कू जाओ ! रामप्यारी के ससुरे को अंदर-बाहर से देख लेना। बिटिया के लिए सब सुख वहां होने चाहिए। ऐसे नहीं ब्याह दूगी वहां।

चुन्नी हंसा।

बोला-ठकुराइन आज तक मेरे कराए ब्याह में कोई बिटिया को गलत घर मिला हो तो बताएं।

ठकुराइन झेंप गईं।

चुन्नी ने गठरी ली। दो हरे के बैल नाधे और मझियारी को निकल पड़ा।

जेठ के दिन थे। सूरज किसी प्रेम में धोका मिले प्रेमी के दिल के समान जल रहा था। कुछ देर में वह मझीयारी पहुंच गया। नाई की खूब आवभगत हुई और अब बात मुद्दे पे आई।

एकै ललौना हे हमार

एक साइकिल और 21 रुपये दहेज के कई रिश्ते आ चुके हैं। हम्ही को लड़की नहीं पसंद आई। पर हरदयाल सिंह की बेटी गौ है। हम ब्याह मघौटे करने को तैयार हैं।

नाई अपने इस प्रयास में सफल हुआ। वह अपनी मां का दूध पीने को लालायित गाय के बछड़े के समान उत्साहित था।

अंततः पंगत बैठी। नाई को भोजन परोसा गया।

… और ये क्या

रोटी में घी नहीं था। साग में स्वाद नहीं था। खाना स्टील के पात्रों में था।

चुन्नी बिफर पड़ा-आपके यहां ऐसे ही खाते हैं।

हां! क्या हुआ?

मैं यहां हरदयाल की बेटी का ब्याह नहीं होने दूंगा यहां। वो कन्या इस घर के लायक नहीं।

बात अब साहूकार के ब्याज के समान बढ़ने लगी थी।

जहां संस्कार ना हो, अतिथि का स्वागत ना हो। ऐसे घर में रामप्यारी नहीं रह पाएगी।

राम प्यारी अप्सरा नहीं है। यहां ऐसे ही होगा। चूल्हा-चौका, गोबर-सानी सब करना पड़ेगा।

नाई के सामने उन लोगों ने अपने छुपे संस्कार काले धन के समान उजागर करना शुरू कर दिया। नाई सुत्करा वापस लेने की जिद पर अड़ा था। वह किसी भी कीमत पर हरदयाल सिंह की मालकिन को दिए वादे की पूर्णता पर अडिग था।

अंततः नाई की जीत हुई। नाई वापस चल दिया। कोठी में पहुंचते ही लोगों का हुजूम जुड़ गया। नाई पूरी बात बताया। मालकिन के अश्रु किसी बरसाती नाले के समान शीघ्र ही बह चले।

इस घटना को हुए एकाध पंद्रहिया बीत गए। कुछ दिनों में सुनने में आया कि मझियारि के जिमिदार का लड़का शराब पीते और जुआ खेलते पकड़ा गया। उन लोगों का चरित्र यूपीएससी के रिजल्ट की भांति शीघ्र उजागर हो गया। बिगड़ैल बेटे की शादी करने को वो इस तरह लालायित थे कि एक पढ़ी-लिखी, संस्कारवान रामप्यारी का भविष्य अंधेरे में डालने में उनको जरा भी संकोच ना था।

समाज में आज भी लड़कियों के ब्याह में बिचौलिए रहते हैं, लेकिन चुन्नी नाई जैसे अब नहीं रहे।

इसीलिए, आज दहेज लिप्सा जैसी सामाजिक बीमारियों की भेंट चढ़कर कितनी बालिकाएं या तो मर गईं या मार डाली गईं। हमें ये दृष्टिकोण बदलने की आवश्यकता है।

(लेखक पंडित खुशीलाल शर्मा गवर्नमेंट ऑटोनोमस आयुर्वेदिक कॉलेज, भोपाल में अध्ययनरत हैं)

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