समाज का जहर

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@ पंडित शैलेश त्रिपाठी ‘शैल’

मां-बाप संतान के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं, लेकिन संतान का बुरा आचरण हमेशा उनको नीचा होने के लिए विवश कर देता है।

दिन ढलने वाला था। आसमान में पश्चिम दिशा किसी नवव्याहता के गालों के समान लाल नजर आ रही थी। ढर्रे के पास श्यामर के पेड़ के नीचे कुत्तों का झुंड जूठे पत्तलों के लिए लड़ रहा था। आज चंपत राय के घर में काफी चहल-पहल थी। बच्चे का जन्म दिन मनाया गया था। जात बिरादर वाले खाने के लिए बुलाए गए थे। महिलाएं दादर गा रही थीं।आज राहुल पूरे सोलह वर्ष का हो चुका था।

राहुल एक लंबा-चौड़ा कद काठी का सजीला नौजवान था। पढ़ने में थोड़ा नहीं, बहुत तंग था। मोटर में घूमना, तरह-तरह के कपड़े पहनना, नदी तैरना, ये उसकी कुछ सिविल सेवा परीक्षा के अभ्यर्थी के समान हॉबी थीं। ठेकेदार राहुल के पिता सूमे से बिनी और चर-चर करती खाट पे बैठे पोथी-पत्रा देख रहे थे। उनको लाख कोशिशों के बावजूद राहुल की कुंडली नहीं मिल रही थी। अंततः पत्रा एक तरफ रखकर अपने जनेऊ में बंधी चाबी से संदूक खोला। उपर से नीचे तक झाड़ने के बाद चाइनीज पन्नी में डली मिली। उन्होंने फौरन उसे निकाला और ऋषिकेश कक्का को कुंडली दिखाई, जोकि आज के कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे।

लाचार बाप बिगड़ैल बेटे के ग्रहों की दशा सुनने को इस कदर आतुर था, जैसे कि इसरो वाले चंद्रयान के लिए थे। काफी देर तक वो गोस्त खाते हुए सिंह के सामने खड़े सियार के समान ऋषिकेश कक्का का मुंह ताक रहे थे। कक्का बोले-” सुना हो ठेकेदार”

“हां कक्का”

मंगल गुरु को तिरछा देख रहा है। शनि की दशा भी कुछ ठीक नहीं है। सावन में शिव पुजा लो।

“हां कक्का”

बात तय कर दी गई। शिव पूजा का जिम्मा ऋषिकेश को दे दिया गया।

राहुल अपने दुर्योधन के समान अनाड़ी दोस्तों के साथ नदी की ओर चल दिया। पुर्रा की दुकान से पतंजलि वाले दो शैंपू लेकर देवीदीन की कोलिया से निकलने लगा।

कुछ दिनों से ये खबर फैली थी कि देवीदीन के घर के आसपास के क्षेत्र में बिस्खापड़ (जहरीला जीव-biskhapad) देखा गया है, और वहीं पे उसने बच्चे भी दे रखे हैं।

राहुल को रोका गया पर वह माना नहीं और उस फुलबारी से पहले से अधिक उपद्रव करता हुआ निकला। विधि का विधान कहिए या संयोग, राहुल का जूता उसके उपर आ गया। वो पलटा और तरबा में काट के 1-2-11 हो गया।

गांव में ये आवाज सूरज की रोशनी के समान फैल गई। ठेकेदार तो मानो ऐसे हो गए जैसे उनमें प्राण ही ना हों। घर में मां का बुरा हाल था। तत्काल बैलगाड़ी भेजकर बहनों को बुलवा दिया गया।

अनायास ही ज्योतिष में कहीं बात सही हो गई। मंगल या शनि जो कहिए, तिरछा तो कोई उसको देख ही रहा था।

इधर, ऋषिकेश कक्का को लोग देवता मानने लगे। कुछ ही देर पहले उन्होंने भविष्यवाणी की थी, जो सही हो गई।

राहुल को आंगन में लिटा दिया गया। लड़के की जान बचाने वाले को इनाम की घोषणा कर दी गई। आसपास के गांव से कई ओझा आए। मुन्ना वैद्य भी आया, लेकिन विष उतारने का तरीका किसी को नहीं आया।

कोरियाने बस्ती में एक फक्कड़ बाबा रहते थे। उनको ये खबर आल इंडिया रेडियो की भांति देर से ही सही, पर ललबा के लड़के लल्लू से मिली, जो किसी पत्रकार की तरह हर किसी को घटना से अवगत कराते हुए चला आ रहा था।

बाबा फौरन अपनी घोटानी उठाया और लपक कर ठेकेदार के घर की ओर भागा। सभी मेहमान, गांव वाले, ओझा, वैद्य जा चुके थे। वह अंदर झांका और बोला-“लाला को यहां लाओ “

ठेकेदार रुतबे वाले व्यक्ति थे। वे बाप के अलावा किसी के सामने नहीं झुके थे पर राहुल के लिए ठेकेदार किसी बड़े पेड़ की डाली के समान झुकने को तैयार थे।
चार लोग राहुल को उठाकर बाहर के चौतार पे रख दिए। फक्कड़ ने कुछ पढ़कर राहुल के मुंह पे पानी फेंका और बड़े दिलेर स्वर में कहा-“लाला बच जाएंगे। घड़ी भर बाद आंखें खुल जाएंगी।” कहकर फक्कड़ चला गया।

राहुल सुबह तक स्वस्थ हो गया। जहर जा चुका था।

पर वो जहर जो उसके अंदर समाज द्वारा उसको बर्बाद करने के लिए डाला गया था, वो कभी नहीं निकला।

आज 56 बरस हो रहे हैं। ठेकेदार अब दुनिया में नहीं हैं।

आज भारतवर्ष में ऐसे करोड़ों राहुल हैं। मां-बाप संतान के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं, लेकिन संतान का बुरा आचरण हमेशा उनको नीचा होने के लिए विवश कर देता है।

(लेखक पंडित खुशीलाल शर्मा गवर्नमेंट ऑटोनोमस आयुर्वेदिक कॉलेज, भोपाल में अध्ययनरत हैं)

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