दो बीघा जमीन

काकी की आंखों में तारे भर आए थे। वो मिट्टी की कच्ची दीवार पे टंगी जगतधारी की फोटो को देख के मन ही मन कहती हैं
-हे भगवन! तुम गरीब को गरीब कभी नहीं किए। तुमने उसे धैर्य दिया, सद्बुद्धि दी, प्रेम का मार्ग दिखाया।

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@शैल

अद्रा नक्षत्र बीत चुका था। बादल दिल लगाकर बारिश कर चुके थे।
लुद्दा सुबह-सुबह काकी से रोटी और भरता बनाने का आग्रह कर रहा था। उसको आज तलाए के पार वाले खेत में जोतने जो जाना था। हर नधकर बैलों के गले में गेंराव लगा दिया था। जमुआ बैल हठीला था, लेकिन धौरा सीधा साधा था। अतः लूद्दा को भय था कि कहीं जमुआ ज्वात ना तोड़ दे।

काकी बाहर आईं। लुद्दा को खाने की पोटली दीं। बैलों को पुचकारा, बैल उनके स्नेह के सामने मूर्तिवत थे। वे ममतामई भावना से ओत-प्रोत वात्सल्य प्रेम को महसूस कर रहे थे। लुद्दा बैलों को लेके चल पड़ा।

खेत पहुंचकर उसने कुण जोतना शुरू कर दिया। बगल में लूलर का खेत था। लूलर उसकी दो बीघा जमीन ठेके पर लेना चाहता था। कई दाव-पेंच भी लगाए थे पर बूढ़ा देने को तैयार ना था। क्योंकि वह जानता था कि इससे जमीन छिन जाएगी। नाती नतुर के लिए वह अपनी जायदाद बचाना चाहता था। खेत जुत गया। लुद्दा तिली छीट आया। एकाध हफ्ते बाद पौधा निपस आया।

दिन आटे-तेल के भाव के समान चढ़ने लगे। क्वार आया। फसल काटने का समय नजदीक आने लगा। लुद्दा अब खेत की चौकीदारी सेना के जवान की तरह करने लगा। उसको लूलर का भय था। पांडे भी इसी जुगत में लगा था कि कब उसकी फसल पे आवारा जानवर छोड़ दे और ये मौका उसको बिना मेहनत के धन के समान जल्दी मिल गया।

पुन्नमासी की रात थी। चंद्रमा की रोशनी किसी स्ट्रीट लाइट के समान फैली थी। लूलर ने गायों के झुंड को खड़ी फसल पे बरसात के पानी की तरह छोड़ दिया। दो पहर बीतते-बीतते वहां टूटे पौधों और गोबर के सिवाय कुछ न था।

सुबह होते-होते ये खबर पूरे गांव में आग की तरह फैल गई कि लुद्दा की खेती में किसी ने जानवर छोड़ दिए हैं।

काकी को संदेशा मिलते ही उन्होंने सिर पीट लिया। लुद्दा रामलोटन के घर के पास अचेत होकर गिर गया। प्रधान, कोटवार, पंचों का हुजूम पहुंच गया। वहां लोगों की बातें किसी टिड्डी दल की तरह उड़ने लगीं।

सांत्वना देने वालों की कोई कमी नहीं थी। पर मदद का हाथ कोई भी नहीं बढ़ा रहा था। उधर, लुद्दा के घर में मचे कोहराम को सुनकर गांव की महिलाएं इस दुख से प्रसन्नतापूर्वक विभोर होने के लिए उसके घर चल पड़ीं। काकी का बुरा हाल था। काकी का लड़का जगदीश मानसिक रोगी था। वो इस मामले को किसी मंदिर की मूर्ति की तरह देख रहा था।

अंततः वही हुआ, जो होता आया है। लोग कानून और धाराओं की बात करके अब थक चुके थे । और वापस अपने घर जाने के लिए लालायित थे। गरीब किसान के लिए इतनी ही सही, सांत्वना तो दी ही उन्होंने।

इस पूरे घटनाक्रम को काकी का नाती जितुआ ध्यान से देख रहा था। वह 12-13 साल का एक गठे शरीर का किशोर था। पढ़ाई में उन्नत था। पर घर में पैसों का अभाव था। इसीलिए सरकारी स्कूल में जाता था। वह रात में काकी के पास गया और बोला-काकी! ओ काकी!

काकी हड़बड़ा के उठ गई । बोली -कौन जीतुआ है क्या!

हां, काकी मैं ही हूं

रात में बिना पनही (जूते) के कहां घूम रहा है। सांप-बिच्छू का डर है। हमेशा की तरह काकी ने उसको अपने पास बुलाया और बिठा लिया।

बगल में मिट्टी के तेल का लालटेन जल रहा था। जित्तूआ ने काकी से कहा-काकी हमारे कितने खेत हैं?

एक ही है बेटा।

कितना बड़ा है?

दो बीघा।

काकी, दो बीघा क्या होता है?
उतना, जितने में हम, लुद्दा काकु, बाप और तुम सभी खा सकते हैं।

तो काकी हमारे खेत में जानवर आएगा तो हम सभी कैसे खाएंगे?

काकी-निरुत्तर

अच्छा काकी-तुम, बब्बा, दद्दा खा लिया करना।

क्यों? फिर तू?…

काकी मेरे हिस्से का जानवर खा जाते हैं। और नारायण भगवान कहते हैं ना कि जानवरों को मारना नहीं चाहिए। तुमने तो कभी जमुआ और धौरा को नहीं मारा।

अबोध बालक की बातें सुनकर काकी महाभारत की द्रोपदी के समान स्तब्ध रह गई। वो चकित थी कि इस बालक में अपनी फसल बर्बाद करने वाले के प्रति ना तो गुस्सा है, ना ही जानवरों के प्रति नफरत।

काकी की आंखों में तारे भर आए थे। वो मिट्टी की कच्ची दीवार पे टंगी जगतधारी की फोटो को देख के मन ही मन कहती हैं
-हे भगवन! तुम गरीब को गरीब कभी नहीं किए। तुमने उसे धैर्य दिया, सद्बुद्धि दी, प्रेम का मार्ग दिखाया।

काकी ने बच्चे की तरफ देखा। वो फटी हुई कथरी में सो चुका था। काकी ने लालटेन बुझाया और वो भी गरीबी की चादर ओढ़कर सो गईं।

आज भी समाज में कई लूलर और लुद्दा मौजूद हैं। हमें दोनों के ही प्रति अपना नजरिया बदलने की जरूरत है।

(लेखक पंडित खुशीलाल शर्मा गवर्नमेंट ऑटोनोमस आयुर्वेदिक कॉलेज, भोपाल में अध्ययनरत हैं)

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