सावन की रात

बागों में पंछी हैं चहके,
देख के उनको हम भी बहके
सुबह-सुबह की मीठी बूंदें
उठा रहीं तुमको कह कह के

उठ जा प्यारी, ओ नखराली
ना दे अब रातों को गाली
बिछी छितरिया है उपवन में
जा बागों में बन जा माली

सुनी सुनाई प्यार की बातें
कट जाती थीं सारी रातें
फिर मुझको वो पल दिलवा दो
प्यार का वो अमृत पिलवा दो।

लौट चुकी हैं फिर वो यादें
याद आ गईं आपकी बातें
बस वो शाम सुनहरी आए
फिर कोई मुझको वहां बुलाए
जहां बसी हैं आपकी यादें
कोई उस गोद में मुझे सुलाए

पार हो गई रात वो काली
जाग जा ओ प्यारी नखराली।

@शैल

(अध्ययनरत, पंडित खुशीलाल शर्मा गवर्नमेंट ऑटोनोमस आयुर्वेदिक कॉलेज, भोपाल)

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