बाबुल तेरे जैसा फरिश्ता देखा नहीं मैंने…

नींव रखी जिसने घर के सुख की पिता जीवन का अथाह सागर अनमोल धरोहर इनकी छावनी में बच्चे जीवनशैली के हुनर सीखते हैं। संवेदनशील भाव से भरपूर हर पथ पर परीक्षण कर मंजिल तक आते हैं। लिख दूं मैं कोई ऐसा अफसाना रहनुमा बाबुल पिता तेरे जैसा कोई फरिश्ता नहीं देखा है मैंने, जीवन गम के धूप में सेंकती समस्या से उभरने की कला इक पिता ही सिखा सकते हैं।

जलते हुए दीये को तपते हुए तेरे बलिदान को इनके जैसा जग में कोई अपना नहीं देखा है मैंने
इन्हें तप में तपस्वी मनुष्य सुखद अनुभव महसूस करते हैं, ठुकराए जग जब इनके सीने से लिपट स्पर्श उंगलियों तले में कदम को बढ़ाने की क्षमता होती है। घाव जब भरकर दर्द देने लगे, हरी घास भी जब चुबने लगे।

मरहम, राहत इनके जैसा नहीं देखा है मैंने, उल्लंघन, उलझनों में जिदंगी घायल पडे़।
आखों से सैलाब उभर आए तानों, गमों की महफिल महफूज हो जाए
तब इनकी सलाह, जख्मों को मात दे जाए।

मूसलाधार वर्षा आशीर्वाद की हो पिता जैसा फरिश्ता नहीं देखा मैंने
यूं तो जिंदगी की राहों में दर्द गम आते हैं।
तकलीफों से सफर होता है ।पडा़व में
सारे दर्द आसान हो जाते हैं। तेरी आहट से निःशब्द कैसे बयां करूं इनके अस्तित्व को, बिना इनके तो जग सूना सा लगता है।

मेरा गर्व मेरी बेटी बेटा कह देना
फिर इनकी बांहों में सिमट जाना ऐसे एहसास की अनुभूति नहीं देखा मैंने। पिता बादल की वह चादर जिसमें सारे दुखों का मरहम मिलता है।

अंकिता सिन्हा
जमशेदपुर, झारखंड

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