बदली-बदली सी दुनिया

कोरोना ने भले ही हमारी अर्थव्यवस्था और व्यवस्था को नुकसान पहुंचाया हो, लेकिन इस जंग में भी मानवता की ही होगी जीत

आशीर्वाद सिंह

कोरोना संकट ने चीन छोड़कर लगभग सभी देशों की व्यवस्था और अर्थव्यवस्था को कम से कम दस साल पीछे धकेल दिया है। आश्चर्यजनक रूप से जो देश जितना शक्तिशाली और आर्थिक रूप से मजबूत होने का दम भारत था, कोरोना ने उसको उतना ज्यादा नुकसान पहुंचाया है। इसके विपरीत भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, वियतनाम और तमाम विकासशील देशों में हालात अब भी बेकाबू नहीं हुए हैं। आम दिनों में बात-बात पर धरना-प्रदर्शन करने वाले देश के राजनीतिक दल परिपक्वता का परिचय देते हुए परोक्ष या अपरोक्ष रूप से सरकार के कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रहे हैं। केंद्र सरकार के किसी कदम का विरोध नहीं कर रहे हैं। खैर, यही हमारे लोकतंत्र और मुल्क की विशेषता है, अनेकता में एकता।

अर्थव्यवस्था पर गहरा असर

अब बात करते हैं कोरोना से नुकसान की। बेशक, कोरोना ने पहले से ही बैंक घोटालों, उनके एनपीए और ऐसी तमाम वित्तीय समस्याओं से जूझ रही भारत की अर्थव्यवस्था को कम से कम दस साल और पीछे धकेल दिया है। यह पहले से ही खयाली पुलाव लग रहे पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था के केंद्र सरकार के सपने के चकनाचूर होने जैसा है।

क्या फिर लौटेंगे मजदूर

कोरोना के कारण बंद हुए उद्योगों को दोबारा चालू करने के लिए न सिर्फ बड़ी पूंजी चाहिए, बल्कि दक्ष मैनपावर की भी जरूरत पड़ेगी। ऐसा इसलिए क्योंकि इन उद्योगों में वर्षों से कम कर रहे कामगारों का पलायन हो चुका है। आसान शब्दों में कहें तो सभी अपने-अपने घर लौट चुके हैं या लौटने की जद्दोजहद कर रहे हैं। कोई डम्पर में छिपकर घर पहुंचा तो कोई हजारों किलोमीटर की पैदल यात्रा करके, साइकिल चलाकर तो कोई ठेले पर घर पहुंचा। कई लोगों की तो रास्ते में ही जान चली गई। इतना कष्ट झेल चुके कामगार अब शायद ही अपनी पुरानी फैक्ट्री में काम करने के लिए लौटें। अगर लौटेंगे भी तो ज्यादा प्रोफेशनल होकर। वे न सिर्फ ज्यादा वेतन और सुविधाएं मांगेंगे बल्कि मालिक या संस्थान के प्रति पहले की तरह लगनशील नहीं रह पाएंगे। उनके मन में हमेशा टिस रहेगी कि जिस फैक्ट्री या मालिक को वे हमेशा अपना मानते थे, वो बुरा वक्त आने पर एक महीने भी अपने आंचल में उन्हें नहीं रख पाए। उन्हें भूखे-प्यासे कोरोना के सामने मरने के लिए छोड़ दिया। विश्वास का यह संकट शायद ही जल्दी दूर हो पाए। याद रखिये उद्योग रोजगार देते हैं, तो कामगार भी उसे अपने खून-पसीने से सींचता है।

बहुत कुछ बदल देगा कोरोना

हर चीज के दो पहलू होते हैं। एक अच्छाई और दूसरी बुराई। अभी हम कोरोना से हुए नुकसान की बात कर रहे थे। इसके कुछ सकारात्मक पक्ष भी हैं, जिनसे हम एक झटके में बीस साल आगे चले गए हैं।

पहले पढ़ाई की बात

भारत में अभी तक यही माना जाता था कि बिना स्कूल गए ज्ञान नहीं मिलता। कोरोना संकट ने इस मिथक को तोड़ दिया है। शहर के निजी लक्जरी स्कूल हों या गांव का दूरदराज का सरकारी विद्यालय। सभी छात्र मजे से ऑनलाइन पढ़ाई कर रहे हैं। सहारा बने हैं मोबाइल फोन, जिन्हें पहले मां-बाप बच्चे के हाथ में देखते ही बरस पड़ते थे। ऑनलाइन पढ़ाई को स्वीकार करने में शायद हमें दस-पंद्रह साल लग जाते, लेकिन कोरोना ने इसे एक झटके में न सिर्फ हकीकत में बदल दिया है, बल्कि लोगों ने स्वीकार भी कर लिया है। बच्चे तो लग ही नहीं रहे हैं कि उनके लिए ऑनलाइन पढ़ाई कोई नई चीज है। उन्होंने इसे पूरी तरह आत्मसात कर लिया है।

अब बात करते हैं बड़ों की

कुछ महीने पहले तक यही माना जाता था कि जितनी बड़ी कंपनी, उतनी बड़ी बिल्डिंग में उसका ऑफिस होना चाहिए। लेकिन, कोरोना ने सभी को वर्क फ्रॉम ऑफिस का फॉर्मूला भी तुरंत समझा दिया है। प्राइवेट कंपनियों के बड़े से लेकर छोटे कर्मचारी तक बड़े मजे से वर्क फ्रॉम होम कर रहे हैं।

आगे होगा ये

अभी तक ऑफिस की बिल्डिंग, उसके रख-रखाव पर भारी-भरकम रकम खर्च कर रही कंपनियां, भविष्य में अपेक्षाकृत छोटे कार्यालयों से संचालित होंगी। उनका अधिकतर स्टाफ वर्क फ्रॉम होम यानी घर बैठे काम करेगा। कंपनियों को भवन, वाहन, बिजली और पानी जैसी बुनियादी जरूरतों पर भारी-भरकम रकम नहीं खर्च करनी पड़ेगा। कर्मचारी को भी ऑफिस में नौकरी करने के लिए अपना गांव और घर छोड़कर सैकड़ों किलोमीटर दूर तमाम दुश्वारियां सहकर शहरों में नहीं रहना पड़ेगा। कर्मचारियों को घर बैठे असाइनमेंट मिल जाएगा और वे अपने अधिकारियों से वीडियो कॉलिंग के जरिये जुड़े रहेंगे। हां, बहुत जरूरी होगा तो पांच-छह महीने में एक बार ऑफिस या किसी होटल में मीटिंग हो जाया करेगी।

बदल जाएगी आइटी इंडस्ट्री की सूरत

अभी तक आइटी (इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी) इंडस्ट्री सेज (स्पेशल इकोनॉमिक जोन) में भव्य भवनों में संचालित हो रही है। इन कंपनियों के फाइव स्टार परिसरों में सैकड़ों कर्मचारी एक साथ काम करते हैं, लेकिन यहां भी बदलाव की बयार पहुंच गई है। आइटी प्रोफेशनल वर्क फ्रॉम होम कर रहे हैं। इसके प्रदर्शन में भी कोई कमी नहीं है। उलटे, कोरोना संकट और इसके बाद सबसे ज्यादा फायदा आइटी इंडस्ट्री को ही होने वाला है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मांग अचानक कई गुना बढ़ जाएगी। वो दिन दूर नहीं, जब बड़ी-बड़ी आइटी कंपनियों के कार्यालयों में सर्वर और सिस्टम की देखरेख के लिए सिर्फ कुछ कर्मचारी और रोबोट रहेंगे। शेष कर्मचारी घर या अपने गांव में बैठे-बैठे डेटा एनालिसिस कर रहे होंगे। उन्हें महानगरों में अपनी कमाई की 80 फीसद राशि मकान किराए और रहने-खाने में नहीं खर्च करनी पड़ेगी।

महानगरों और शहरों पर कम होगा जनसंख्या का दबाव

ऑनलाइन क्लासरूम, कोचिंग क्लास जैसी सुविधाओं के विस्तार से विभिन्न राज्यों के विद्यार्थियों को कोटा और अन्य शहरों के धक्के नहीं खाने पड़ेंगे। वे घर बैठे अपेक्षाकृत कम खर्च में ऑनलाइन मैटेरियल से प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर सकेंगे। इससे शहरों पर आबादी का बोझ कम होगा।

इंफ्रास्ट्रक्चर पर देना होगा ध्यान

इस बदलाव को स्वीकार करते हुए कंपनियों और सरकार को आइटी तथा इससे जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर पर विशेष ध्यान देना होगा। खासतौर पर फाइव-जी टेक्नोलॉजी को जल्द से जल्द जमीन पर उतारना होगा। जहां तक नौकरियों पर खतरे की बात है तो कंप्यूटर के आगमन के समय भी लोग कहते थे कि कंप्यूटर सबकी नौकरियां ले लेगा, लेकिन हुआ इसका ठीक उल्टा। आज आइटी इंडस्ट्री निजी क्षेत्र में सबसे ज्यादा नौकरियां दे रही है। इसलिए, बेहतर होगा कि संकट की इस घड़ी को भी हम भारतवासी अवसर में बदलें।

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