धिक्कार है ऐसे घृणित कर्म पर…

धिक्कार है मानव तेरे घृणित कर्म कृत्यों पे
प्रहार किए पटाखों से गर्भवती मां हथिनी पे

बलशाली कहाने को आतुर तुच्छ जीव हे मानव
दया ना आई तुझे बेजुबां जीव की मार्मिकता पे

हाथी मेरे साथी दोस्ती की मिसाल घायलावस्था
चीख आवाज बहती नदी आंखें नम हालातों पे

शर्मसार करे मानवता को जो तुच्छ प्राणी है जग में
बलात्कारी मानव दुहराते कथा नारी चीरहरण पे

प्रेम दया की सीख देती खामोशी लुप्त हुई इक मां
अभिमान की परत अनोखी मानस क्रूरता आखों पे

शब्द लिखूं या लिखूं मानव की भाव दरिंदगी रूप
निःशब्द कलम मौन है धिक्कार है ऐसे जीवन पे

आखिरी सांस कहती होगी खेलो ना हमसे और प्रकृति से
इंसानियत बची नहीं अब दया नहीं इंसान हैवानियत पे

जीवों का सम्मान करो तुम वफादारी को नमन करो
प्रेम बिछाओ नफरतों की जंजीरों में लगे हृदय तालों पे

अंकिता सिन्हा, जमशेदपुर


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