भाव में न बहें

अगर आप भावुक किस्म के इंसान हैं और किसी की चिकनी-चुपड़ी बातों में आकर किसी भाव में बह जाते हैं तो आज के दौर में आप बाजार में मोल-तोल यानी सौदेबाजी में फेल हो जाएंगे। ये बातें आज से करीब पैंतीस साल पहले मेरी दादी ने मुझे उस समय समझाई थीं, जब सूती का एक अंडरवियर दाम और गुणवत्ता के लिहाज से तुलनात्मक रूप से बहुत खराब निकला। उस पर माड़ का इतना अधिक प्रयोग किया गया था कि एक बारगी सरसरी तौर पर देखने के बाद सयाना खरीदार भी गच्चा खा जाए। पर मेरी दादी की सत्तर साल की उम्र में भी नजर और परख इतनी पक्की थी कि वह उसकी कमी उसे देखते ही पहचान गई। तब से पिछले माह तक मैं उनकी सीख पर पूरे शिद्दत से अमल करता रहा। लेकिन, होनी जो होती है, वह होकर रहती है। पिछले महीने मेरी बेटी का एक सरकरी उपक्रम में इंजीनियरिंग पद के लिए साक्षात्कार हैदराबाद शहर के पास एक कार्यालय में होना था। हम बेटी के साथ हैदराबाद गए। वहां का चारमीनार पूरी दुनिया में मशहूर है। हम बेटी का साक्षात्कार खत्म होने के बाद चारमीनार देखने गए। इसी विश्व विख्यात विरासत के आसपास की दुकानों पर मोतियों की ज्वैलरी आइटम और लाख से बनी चूड़ियों की बिक्री होती है। हालांकि, हम इससे पहले भी चारमीनार का दीदार कर चुके थे, लेकिन दुकानों की कार्यशैली समझने या परखने का मौका कभी नहीं मिला था। ज्वैलरी और चूड़ियां लड़कियों के सहज आकर्षण का केंद्र होती हैं। इसी कारण बिटिया का मन कुछ खरीदारी को लालायित हो उठा। वैसे आम तौर पर उसकी 99 फीसदी खरीदारी उसकी मां ही करती हैं। लेकिन, बेटी यदि कुछ कहे तो उसे टालना संभव नहीं होता। कोई भले कितना ही खुद को उसूल वाला क्यों न मानता और जानता हो। हमने उसे हल्के ढंग से सहेजा भी कि सतर्क होकर ही कुछ लेना। उसने स्वीकृति में सिर हिलाया। दो-चार दुकानों में मोलभाव के बाद ऐसा लगने लगा कि वहां के बाजार में हालांकि हर दुकान पर फिक्स रेट का बोर्ड लगा है, लेकिन असलियत कुछ और है। मोल-तोल के बाद भाव कहां तक गिरेगा, यह आंक पाना आसान नहीं। एक जैसे सामान की भी हर जगह अलग-अलग दाम और भिन्न-भिन्न दावे। कुछ दुकानों में घूमने के बाद एक जगह हम रुके। वहां काउंटर पर तैनात युवा बड़ी शालीनता से बात करता मालूम पड़ा। उसके विनम्र स्वभाव और आग्रह के कारण हमने वहां उस दुकान से दो आइटम खरीदे। बातों में उलझाकर यहां तक रखा कि उसने पक्की रसीद भी नहीं दी। दुकान के संचालक के कहीं बाहर होने का हवाला देकर टाल दिया। हम और बेटी दोनों खुश थे कि सही वस्तु और सही दाम उसने लगाया होगा। कुछ देर तक घूमने के बाद हम अपने उस होटल जा पहुंचे, जहां रुके थे। अगली सुबह ही हैदराबाद से वापसी की ट्रेन पकड़नी थी। रात में सामान पैक करते समय जब बेटी ने एक आइटम की पैकिंग खोली तो वह अचंभित रह गई। वो आइटम क्षतिग्रस्त था, लेकिन पूरे करीने से पैक किया गया था। हमें अगली सुबह ही ट्रेन से वापस होना था। लिहाजा, हम वहां रुककर खरीदे गए सामान वापस करने की हालत में नहीं थे। मन खिन्न हुआ पर अचानक दादी का कथन याद हो आया। बेटी को भी वही बताकर ठहाके लगाने लगा। फिर यह संकल्प लिया कि खरीदारी करते समय आगे अब कभी भाव में नहीं बहना है। हमेशा सजग रहना है।

उमेश शुक्ल (लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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