शिक्षा को रोजगार से जोड़ने की जरूरत

अप्रासंगिक हो चुकी देश की शिक्षा व्यवस्था में व्यापक स्तर पर बदलाव की जरूरत हो रही महसूस

उमेश शुक्ल 

कोरोना संकट ने दुनिया के सभी देशों को अपनी-अपनी परंपरागत व्यवस्थाओं पर नए सिरे से सोचने और कुछ नया करने का अनूठा अवसर प्रदान किया है। बड़ी-बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की कार्यशैली और दशा अब बदल जाएगी, यह बात तय है। भारत जैसे विकासशील देश के लिए भी कोरोना संकट ने महत्वपूर्ण चुनौतियां पैदा की हैं। इसमें देश में बड़ी संख्या में विद्यमान शैक्षणिक और तकनीकी संस्थाओं के ठीक से संचालन की अहम जिम्मेदारी भी शामिल है। वैश्विक परिदृश्य को देखते हुए अब हमें आत्मनिर्भरता की दिशा में प्रयास करने होंगे। इसके लिए हमें वर्तमान में प्रचलित पूरी शिक्षा और परीक्षा की व्यवस्था में आमूलचूल बदलाव करने की जरूरत है। दुनिया की दूसरी बड़ी आबादी वाला देश होने के कारण हमारी पहली प्राथमिकता समूची शिक्षा प्रणालियों को रोजगारपरक बनाने की होनी चाहिए। आज जरूरत शिक्षा के उस मॉडल की है, जो युवाओं को रोजगार देकर स्वावलंबी बना सके। उनके हाथों को काम दिला सके। सच में आज देश को समस्या निवारक और रोजगारपरक शिक्षा की जरूरत है। हमें युवाओं को वह व्यावहारिक ज्ञान को देने की जरूरत है, जो उनके जीविकोपार्जन के लिए पर्याप्त हो। हमें अपने युवाओं को इस दृष्टि से तैयार करना है कि वे पूरे आत्मविश्वास के साथ अर्थव्यवस्था में अपना सक्रिय योगदान दे सकें।

वर्तमान शिक्षा व्यवस्था उन अंग्रेजों की देन है, जिन्हें कुछ प्रतिशत ऐसे लोगों की जरूरत थी जो उनके राजतंत्र के कुशल संचालन में मददगार बन सकें। उन्होंने ऐसी शिक्षा और परीक्षा प्रणाली विकसित की, जिसमें वे कुछ लोगों का मनमुताबिक चयन कर सकें। साथ ही बड़े हिस्से को अयोग्य साबित कर तंत्र से दूर रख सकें। उनमें इस हीन ग्रंथि को भी बैठा सकें कि वे सरकारी कार्मिकों की तुलना में कम ज्ञान रखते हैं। यह देश का दुर्भाग्य रहा कि अंग्रेजों के देश से जाने के बाद यहां की शिक्षा व्यवस्था उन लोगों के हाथों में चली गई, जिनकी सोच स्वतंत्र नहीं थी। उनके मानस पर अंग्रेजों की ही छवि अंकित थी। वे उनकी व्यवस्था को ही अंतिम मानकर छिटपुट सुधार करते रहे। शिक्षा देश और समाज की जरूरत के हिसाब से हो, इस तथ्य का ख्याल नहीं रखा गया। प्रशासनिक व्यवस्था अंग्रेजों के मॉडल पर ही चली। लिहाजा, अधिकतम को अयोग्य साबित या घोषित करने वाली शिक्षा और परीक्षा प्रणालियां ही जारी रहीं। इस बात का कतई ध्यान नहीं रखा गया कि शिक्षा व्यवस्था देश में हताशा का माहौल पैदा कर रही। हालांकि, शिक्षा संस्थानों की संख्या साल दर साल बढ़ी, लेकिन देश की वास्तविक जरूरतों का सही आकलन और अधिकतम युवाओं को रोजगार देने की जरूरत ही नहीं महसूस की गई। शिक्षा और तकनीकी शिक्षा के संस्थानों की कार्यशैली को आप इस बात से समझ सकते हैं कि उन सभी में पाठ्यक्रमों को देश की जरूरत के हिसाब से तय करने और जरूरत के हिसाब मानव संसाधन विकसित करने की तड़प कभी नहीं दिखी। दशकों पहले तय अनेक तकनीकी पाठ्यक्रम आज भी चल रहे, जिनकी देश और दुनिया को जरूरत ही नहीं है। हालांकि, कहने को तमाम रोजगारपरक पाठयक्रम विश्वविद्यालयों में चलाए जा रहे हैं, पर उनकी उपयोगिता की कभी समीक्षा नहीं की जाती है। ऐसा इसलिए कि सरकार ने शिक्षा की उपयोगिता आंकने के लिए कोई तंत्र ही नहीं विकसित किया। यही सबसे बड़ी भूल साबित हो रही। हमारे विश्वविद्यालय रुचि का केंद्र न होकर विवशता और समय बिताने का केंद्र साबित हो रहे हैं। तमाम ऐसे युवा मिल जाएंगे जो छात्रवृत्तियों का लाभ लेने भर के लिए किसी न किसी पाठ्यक्रम में दाखिला लेते हैं। वे येनकेन प्रकारेण डिग्रियां बटोरते रहते हैं। ऐसे में अप्रासंगिक पाठ्यक्रमों को पढ़कर निकलने वाले युवाओं की बड़ी संख्या औद्योगिक घरानों की मांग पर खरी नहीं उतर पा रही है। यह सब इसीलिए हो रहा क्योंकि हमने कौशल विकास और रोजगार के तथ्य को ध्यान में नहीं रखा। दूसरी ओर, हमने युवाओं में ऐसी सोच और संस्कृति विकसित की कि अधिकांश श्रम और साहस का इस्तेमाल करने की बजाय सरकारी नौकरी की ही चाह रखते हैं। पद भले चपरासी या सहायक का ही मिले। सरकारी नौकरियों की तादाद बहुत कम है। ऐसे में चपरासी से लेकर कलक्टर तक के पद के लिए इच्छुक युवाओं की तादाद लाखों-करोड़ों में है। आज प्रतियोगी परीक्षाओं में गलाकाट स्पर्धा है। सबसे विचित्र बात यह लगती है कि सरकारें कुछ पदों के विज्ञापन देकर बड़ी संख्या में युवाओं से आवेदनपत्र मांगती हैं। आवेदन से प्राप्त राशि से ही वो सारी प्रक्रिया को पूरी कर कर्तव्यों की इतिश्री मान लेती हैं। बेरोजगार युवाओं की साल दर साल बढ़ती फौज सरकारों को विचलित नहीं करती। शायद यही प्रमुख कारण रहा कि केंद्र या राज्य सरकारों ने कभी शिक्षा को रोजगार से जोड़ने की जरूरत महसूस नहीं की। आज आलम यह है कि आईएएस, पीसीएस समेत विभिन्न परीक्षाओं में वो ही प्रश्न या विषय शामिल हैं, जिनका वास्तविक जीवन में उपयोग न के बराबर होती है। सरकार को गंभीरता से यह विचार करना होगा। केवल इतिहास और भूगोल की तिथियां या गणित और रसायन विज्ञान के फार्मूले रटने वाली शिक्षा और परीक्षा किसी काम की नहीं। हमें सिद्धांत से ज्यादा व्यावहारिक कला, विज्ञान और वाणिज्य समेत सभी विषयों की पढ़ाई का पाठ्यक्रम विश्व और भारत की जरूरतों को ध्यान में रखकर नए सिरे से तैयार करना होगा। हर विषय में उन तथ्यों को शामिल किया जाए, जिनकी जीवन में उपयोगिता हो। वह ज्ञान समाज या देश की समस्याओं का समाधान दे सके। वह ज्ञान रोजगार दिलाने में मददगार हो। सरकारों को सबसे बड़ी पहल प्राथमिक स्तर से ही करनी होगी। सरकारों को ऐसी प्राथमिक शिक्षा प्रणाली विकसित करनी होगी, जो अधिकतम बच्चों को स्वावलंबन की सीख देकर कार्यकुशल बनाए। सरकारों को हर ग्राम पंचायत में प्राथमिक विद्यालयों के बजाय ऐसी कार्यशालाओं का निर्माण करना होगा, जो पूरे गांव और समाज की जरूरतों के लिहाज से उपयोगी वस्तुओं का उत्पादन कर गांव को आत्मनिर्भरता प्रदान करे। इन कार्यशालाओं को नियम बनाकर उद्योगों और व्यापारिक संस्थाओं से जोड़ना होगा, ताकि वे अपने यहां उत्पादित वस्तुओं को बेचकर ग्राम पंचायत की आय को बढ़ाएंं। उनकी सकल आय में से निश्चित हिस्सा बतौर पारिश्रमिक विद्यार्थियों को दिया जाए। यदि वे कुशल हो जाएं तो उन्हें प्रेरक और प्रशिक्षक के रूप में प्रोन्नत कर रोजगार दिया जाए। इससे हर हाथ को काम मिलेगा। हर गांव सकल घरेलू उत्पादन में सहयोग देगा। देश तभी आर्थिक रूप से सक्षम बनेगा, जब वह उत्पादन को बढ़ाए। अभी शिक्षा गैर उत्पादक और अव्यावहारिक है। वह शिक्षित व्यक्ति को रोजी दिलाने में भी अक्षम है।

माध्यमिक और उच्च शिक्षा की व्यवस्था में भी हमें और आगे बढ़कर सोचने की जरूरत है। सिर्फ एक जैसे पाठ्यक्रम की पढ़ाई की बदौलत हम तेजी से बदलती जरूरतों को पूरा नहीं कर सकते। हमें ऐसे तंत्र का गठन करना होगा, जो देश की जरूरतों को ध्यान में रखकर पाठ्यक्रम बनाए। हर पाठ्यक्रम में पंजीकृत युवाओं का आंकड़ा तंत्र के पास हो। किस क्षेत्र को कितने युवाओं की जरूरत होगी, इसका डाटा भी उसके पास हो। इसी को ध्यान में रखकर वह शिक्षा संस्थाओं के लिए पाठ्यक्रम दे। उसकी हर साल समीक्षा करे। समयानुसार उसमें बदलाव करे। शिक्षा संस्थाओं को इस काबिल बनाया जाए कि वे अधिकतम मानव शक्ति को कार्य कुशल और उत्साही बनाएं। युवाओं को रोजगार देकर देश की अर्थव्यवस्था में सक्रिय भागीदार बनाएं। केवल डिग्रियां बांटने तक ही उनकी भूमिका न रहे। अभी आलम यह है कि पीएचडी धारक भी चपरासी या क्लर्क की नौकरी में लाइन में खड़ा हो जाता है। उसे उम्मीद होती है कि सरकारी नौकरी मिल जाने पर ज्यादा श्रम नहीं करना पड़ेगा। उसकी यह सोच समाज से प्राप्त अनुभवों के आधार पर बनी है। यही नहीं, सभी सरकारी विभागों की संरचना, उनकी उपयोगिता और औचित्य पर भी विचार किया जाए। जो निष्प्रयोज्य साबित हो रहे, उन्हें बंद कर समस्याओं के निराकरण में प्रभावी तंत्र विकसित किया जाए। उदाहरण के तौर पर आज सभी कार्यालयों में लिपिक के पद तो हैं, लेकिन कंप्यूटर चलाने का ज्ञान सबको नहीं है। ज्यादातर काम कंप्यूटर पर हो रहे, लेकिन उसे संपादित करने का ज्ञान सबमें नहीं है। इससे कार्यालयों की गतिशीलता भी प्रभावित होती है।

उमेश शुक्ल 

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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